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________________ ९०८ सूर्यप्रशप्तिसूत्रे विक्खंभेणं पण्णरसजोयणसयसहस्साई एक्कासीयं च सहस्साई सयं च ऊतालं किंचिविसेसूणं परिक्खेवेणं आहिएत्ति वएज्जा' तावत् द्वे योजनशतसहसे चक्रवालविष्कम्भेनपञ्चदश योजनशतसहस्राणि एकाशी तिश्च सहस्राणि शतं च ऊनचत्वारिंशत् किश्चित् विशेषोन परिक्षेपेण आख्यात इति वदेत् ॥ तावदिति पूर्ववत् द्वे योजनशतसहस्र-द्वे लक्षे (२०००००) चक्रवालविष्कम्भेन-व्यासेन, तथा पञ्चदश योजनशतसहस्राणि (१५०००००) पञ्चदश लक्षाणि, एकाशीतिः सहस्राणि (८१०००) शतमेकोनचत्वारिंशदधिकं (१३९) किञ्चिद विशेषोन परिक्षेपेण-परिधिना आख्यातः अर्थात् (१५८११३९) एतावान् परिधिश्चेति ॥ अत्र युक्तिरुच्यते-लवणसमुद्रे एकतोऽपि द्वे योजनशतसहस्र चक्रवालविष्कम्भोऽस्ति तथा अपरतोऽपि द्वे योजनशतसहस्र चक्रवालविष्कम्भोऽस्ति, मध्ये च जम्बुद्वीपो योजनशतसहस्रमिति सर्वसंख्यायोगेन=(२०००००+२०००००+१०००००-५०००००) पञ्चविंशतिर्दश च शून्यानि, दशभिर्गुण्यन्ते जातान्येकादश शून्यानि-पञ्चविंशतिः खर्वाजोयणसहस्साई चक्कवालविक्खंभे णं पण्णरस जोयणसयसहस्साई एक्कासीयं च सहस्साई सयं चऊतालं किंचिविसेसूणं परिक्खेवेणं आहिएत्ति वएना) दो लाख योजन (२०००००) चक्रवाल विष्कंभ से अर्थात् इतना उस का व्यास मान है ।(१५०००००) पंद्रह लाख इक्यासी हजार (८१०००) एक सो उन्चालीस (१३९) से कुछ विशेष न्यून परिधिवाला कहा है। अर्थात् (१५८११३९) इतनी उसकी परिधि होती है, यहां पर युक्ति इस प्रकार से हैलवण समुद्र में एक तरफ दो लाख योजन का चक्रवाल विष्कंभ है तथा दूसरी ओर भी दो लाख योजन का चक्रवाल विष्कंभ होता है मध्य में जम्बूद्वीप एक लाख योजन का है सब को मिलाने से (२०००००+२०००००+१००००० =५०००००) पचीस एवं दस शून्य को दस से गुणा करे तो ग्यारह शून्य होतो है-अर्थात् पचीस खर्व २५००००००००००० । इस संख्या का वर्गमूल विक्ख भेण पण्णरसजोयणसयसहस्साई एक्कासीय च सहस्साई सयं चऊताल किंचिविसेसूर्ण परिक्खेवेणं आहिएत्ति वएज्जा) मेदा योन (२०००००) analqetथी अर्थात् આટલું તેનું વ્યાસમાન છે, (૧૫૦૦૦૦૦) પંદરલાખ એકાશીહજાર (૮૧૦૦૦) એકસો ઓગણચાળીસ (૧૩)થી કંઈક વિશેષ ન્યૂન પરિધિવાળે કહેલ છે. અર્થાત્ (૧૫૮૧૧૩૯) આટલા પ્રમાણવાળી તેની પરિધી હોય છે અહીયાં યુક્તિ આ પ્રમાણે છે-લવણ સમુદ્રમાં એક તરફ બે લાખ એજનને ચકવાલ વિઝંભ છે, તથા બીજી તરફ પણ બે લાખ એજનને ચક્રવાલવિષ્કભ છે મધ્યમાં જંબુદ્વીપ એકલાખ જન છે, બધાને મેળવવાથી (२०००००+२०००००+१०००००=५०००८० पयास मने इस शून्यनो शून्य थाय छ, अर्थात् ५यास पर्व (२५०००००००००००) २॥ सध्यानु का भूण ४२१भाटे सभी५२५ ३८ શ્રી સુર્યપ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર: ૨
SR No.006352
Book TitleAgam 16 Upang 05 Surya Pragnapti Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1982
Total Pages1111
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_suryapragnapti
File Size77 MB
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