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________________ सूर्यप्रतिप्रकाशिका टीका सू० ८२ चतुईश'प्राभृतम् ७२५ प्रकारेण खल्विति निश्चितं अन्धकारपक्षतः-अन्धकारपक्षापेक्षया ज्योत्स्नाप-शुक्लपक्षे ज्योत्स्ना बहु-प्रभूता ज्योत्स्ना भवतीति आख्याता-प्रतिपादिता इति वदेत्-कथयेत् । अत्र युक्तिरुच्यते-अत्र शुल्लपक्षे प्रतिपत् प्रथमक्षणादारभ्य प्रतिमुहूर्त यावन्मानं यावन्मात्रं क्रमशः शनैः शनैश्चन्द्रः प्रकाशितः-प्रकारो भवति, तथैव अन्धकारपक्षे प्रतिपत्प्रथमक्षणादारभ्य प्रतिमुहर्त तावन्मात्रं तावन्मानं शनैः शनैश्चन्द्रो राहुविमानेनावृतः सन् अदृश्यत्वम प्रकटत्वमुपजायते, एवं सति यावत्येव शुक्लपक्षे ज्योत्स्ना तावत्येवान्धकारपक्षेऽपि ज्योत्स्ना भवति, किन्तु प्रदेशभेदात् दृश्यादृश्ये वैलक्षण्यमुपजायते, तथा च प्रकाशान्धकारयोः प्रतिबिम्बस्वरूपा दृश्या छायापि भवतीति नियमदर्शनात् शुक्लपक्षस्य पञ्चदश्यां यादृशी ज्योत्स्ना परिदृश्यते न तादृशी ज्योत्स्ना प्रदेशविषयेऽपि कृष्णपक्षस्य पत्र. दश्याममालक्षणायां परिदृश्यो भवतीति नियमात् अन्धकारपक्षात् ज्योत्स्नापक्षे प्रभूता ज्योत्स्ना भवतीत्याख्याता....॥ अथ ज्योत्स्नापरिमाणविषयकः प्रश्न-'ता केवइया णं दोसिणा पक्खे दोसिणा वहू होता है, ऐसा स्वशिष्यों को उपदेश करें । अब यहां पर इस विषय में युक्ति कही जाती है-यहां शुक्लपक्ष के प्रतिपदा तिथि के प्रथम क्षण से आरंभ कर के प्रतिमुहर्त में यावन्मात्र क्रम से धीरे धीरे चंद्र का प्रकाश होता है, उसी प्रकार कृष्णपक्ष में प्रतिपदा की प्रथम क्षण से आरंभ करके प्रत्येक मुहूर्त में उतना उतना धीरे धीरे क्रमशः चंद्र राहुविमान से आवृत होकर अदृश्य होता जाता है, इस प्रकार जितना प्रमाण शुक्लपक्ष में प्रकाश होता है, उतना ही प्रमाण कृष्णपक्ष में भी प्रकाश होता है, परंतु प्रदेश भेद से दृश्यादृश्य में विलक्षणता आ जाती है । तथा प्रकाश एवं अन्धकार का प्रतिबिम्ब स्वरूप अपने अपने प्रमाण की छाया भी रहती है इस नियम से शुक्लपक्ष की पंद्रहवी तिथि में जितना प्रकाश दिखता है, उतना प्रकाश प्रदेश विषय में कृष्ण पक्ष की पंद्रहवीं अमावास्यारूप तिथि में नहीं दिखता है, इस नियम से कृष्ण पक्ष से शुक्लपक्ष में अधिक प्रकाश रहता है इस प्रकार कहा जाता है। હવે અહીં આ વિષયમાં યુક્તિ બતાવવામાં આવે છે. અહીં શુક્લ પક્ષની એકમ તિથિના પહેલા ક્ષણથી આરંભ કરીને દરેક મુહૂર્તમા યાવન્માત્રકમથી ધીરે ધીરે ચંદ્રને પ્રકાશ થાય છે. એ જ પ્રમાણે કૃષ્ણપક્ષમાં એકમની પ્રથમ ક્ષણથી આરંભીને દરેક મુહુર્તમાં ધીરે ધીરે એટલે એટલે ક્રમશઃ ચંદ્ર રાહુવિમાનથી ઢંકાઈને અદશ્ય થતું જાય છે. આ રીતે જેટલા પ્રમાણમાં શુકલ પક્ષમાં પ્રકાશ થાય છે. એટલાજ પ્રમાણમાં કૃષ્ણપક્ષમાં પણ પ્રકાશ હોય છે. પરંતુ પ્રદેશભેદથી દશ્યાદશ્યમાં વિલક્ષણપણું આવે છે. તથા પ્રકાશ અને અંધકારના પ્રતિબિંબ સ્વરૂપ પિતપતાના પ્રમાણની છાયા પણ રહે છે. આ નિયમથી કૃષ્ણપક્ષ કરતાં શુકલપક્ષમાં વધારે પ્રકાશ રહે છે. તેમ કહેવાય છે. શ્રી સુર્યપ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્રઃ ૨
SR No.006352
Book TitleAgam 16 Upang 05 Surya Pragnapti Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1982
Total Pages1111
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_suryapragnapti
File Size77 MB
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