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________________ सूर्यज्ञप्तिप्रकाशिका टीका सू० १०३ एकोनविंशतितमप्राभृतम् १००७ सूरवरे दीवे सूरवरे समुद्दे सूरवरोवभासे दीवे सूरवरोवभासे समुद्दे' एवं त्रिप्रत्यवताराः ज्ञातव्याः यावत् सूर्यों द्वीपः सूर्यवरः समुद्रः, सूर्यवरावभासो द्वीपः सूर्यवरावभासः समुद्रः।एवं-पूर्वोदितेनैव प्रकारेण त्रिप्रत्यवतारा:-द्वीप प्रतिद्वीपाः, समुद्र प्रतिसमुद्राश्चेति त्रिप्रकारकाः द्वीपसमुद्राः ज्ञातव्याः , सर्वत्र च सूर्यद्वीप सूर्योद समुद्र, सूर्यवर द्वीप सूर्यवरोद समुद्र सूर्यवरावभास द्वीप सूर्यवरावभास समुद्रेषु इत्थमेव रुचकद्वीप रुचकोदसमुद्रादिवदेव विष्कम्भ-परिक्षेप-चन्द्र-सूर्यग्रह नक्षत्र-तारागण कोटिकोटीनाश्च प्रमाणानि ज्ञातव्यानीति । कियन्तो नाम नामग्रहणं द्वीप समुद्राः प्रवक्तुं शक्यन्ते ?, तेन यानि कानिचित् आभरणनामानि हारार्द्धहारकनकावलि रत्नावलि प्रभृतीनि, यानि च वस्त्रनामानि यानि च गन्ध नामानि कोष्टपुटादीनि यानि च उत्पल नामानि-जलरुह चन्द्रोद्योत प्रमुखानि, यानि च तिलकप्रभृतीनि वृक्ष नामानि, यानि च पद्मनामानि-शतपत्र सहस्रपत्र प्रभृतीनि, यानि च सूरे दीवे सरोदे समुद्दे सूरवरे दीवे, सूरवरे समुद्दे सूरवरावभासे दीवे सरवरावभासे समुद्दे) इस प्रकार त्रिप्रत्यवतार का कथन यावत् सूर्य द्वीप एवं सूर्य वर समुद्र, सूर्यवरावभास द्वीप एवं सूर्य वरावभास समुद्र पर्यन्त इस पूर्व कथित प्रकार से त्रिप्रत्यवतारदीप, प्रतिद्वीप, समुद्र प्रतिसमुद्र इस प्रकार तीन प्रकार का द्वीपसमुद्रों को समझलेवें। सर्वत्र-सूर्यद्वीप, सूर्योदसमुद्र, सूर्यवर द्वीप सूर्यवरोद समुद्र, सूर्यवरावभास द्वीप, सूर्यवरावभास समुद्रों में इस रुचक द्वीप एवं रुचकोद समुद्रादि के समान विष्कंभ परिक्षेप चन्द्र-सूर्य-ग्रहनक्षत्र तथा तारागण कोटिकोटी का प्रमाण समझलेवे, कितनेक द्वीप समुद्र का नाम कहना शक्य होता है। एवं कितनेक का आभरण के समान नाम होते हैं जैसे की-हारार्द्ध हार, कनकावलि, रत्नावलि, आदि तथा कितने का वस्त्र समान नाम होते हैं जो गन्ध समान नामवाले होते हैं कोष्टपुटादिः कितनेक उत्पल नाम वाले हैं-जैसे कि जलरुह, चन्द्रो द्योत आदि कितनेक तिलक आदि वृक्ष के समान नाम वाले होते हैं, तथा कितनेक पद्म के समान नाम वाले होते सूरवरे दीवे, सूरवरे समुद्दे, सूरवरावभासे दीवे सूरवरावभासे समुद्दे) मा प्रमाणे विप्रत्यवतारनु કથન યાવત્ સૂર્યદ્વીપ અને સૂર્યવર સમુદ્ર, સૂર્યવરાવભાસદ્વીપ અને સૂર્યવરાવભાસ સમુદ્ર પર્યન્ત આ પૂર્વકથિત પ્રકારથી વિપત્યવતાર દ્વીપ, પ્રતિદ્વીપ, સમુદ્ર, પ્રતિસમુદ્ર આ રીતે ત્રણ પ્રકારના દ્વીપ સમુહો સમજી લેવા, બધે સ્થળે સૂર્યદ્વીપ સૂદ સમુદ્ર, સૂર્યવરદ્વીપ, સૂર્યવરદ સમુદ્ર, સૂર્યવાવભાસ દ્વીપ અને સૂર્ય વરાભાસ સમુદ્રોમાં આ રૂચકદ્વીપ અને રૂચકોર સમુદ્રાદિની જેમ વિષ્કભ-પરિક્ષેપ ચંદ્ર-સૂર્ય, ગ્રહ-નક્ષત્ર તથા તારાગણ કેટકેટિનું પ્રમાણ સમજી લેવું, કેટલાક દ્વીપસમુદ્રોના નામે કહેવામાં શક્ય હોય છે, કેટલાકના આભૂષણોની સમાન નામે હોય છે, જેમ કે-હારાધહાર, કનકાવલિ, રત્નાવલિ, વિગેરે. તથા કેટલાકને વસ્ત્ર સરખા નામે હોય છે. કેટલાકના ગંધ સમાન નામે હોય છે. કેટ્ટપુટાદિ કેટલાક ઉત્પલ નામવાળા હોય છે. જેમ કે-જલરૂહ, ચન્દ્રોદ્યોત શ્રી સુર્યપ્રજ્ઞપ્તિ સૂત્ર: 2
SR No.006352
Book TitleAgam 16 Upang 05 Surya Pragnapti Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1982
Total Pages1111
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_suryapragnapti
File Size77 MB
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