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________________ अनगारधर्मामृतवर्षिणी टीका अ० ५ सुदर्शनश्रेष्ठीवर्णनम् ६७ यत्रैव सौगन्धिका नगरी यत्रैव परिव्राजकावसथः, तत्रैवोपागच्छति, उपागत्य परिव्राजकावसथे भाण्डकनिक्षेपं करोति = त्रिदण्डादीन्युपकरणानि स्थापयति, कृत्वा सांख्यसमयेन सांख्यसिद्धान्तानुसाराचारेण आत्मानं भावयन् विहरति। ततः खलु सौगन्धिकायां नगर्या शृङ्गाटकत्रिकचतुष्कचत्वरेषु यावद् राजपथेषु बहुजनोऽन्योन्यस्य परस्परम्-एवमाख्याति - कथयति, एवं खलु शुको नाम परिव्राजक इह अस्यां सौगन्धिकायां नगर्या हव्यमागतः समागतः यावदास्मानं भावयन् विहरति । परिषनिर्णता । मुदर्शनोऽपि निर्गतः। ततः खलु स आश्रम था वहां आया। ( उवागच्छित्ता परिव्वायगावसहंसि मंडलनिक्खेवं करेइ, करित्ता संख समणेणं अप्पाणं भावमाणे विहरइ ) आकर उसने उस परिव्राजकाश्रम में अपने भांडों को रख दिया। और रख कर सांख्य सिद्धान्त के अनुसार अपनी प्रवृत्ति चालू रखता हुआ ठहर गया। (तएणं सोगंधियाए नयरीए सिंघाडगतिगचउक चच्चरेसु बहुजणो अन्नमन्नस्स एवमाइक्खइ ) इसके बाद उस सौंगंधि का नगरी में श्रृंगाटक, त्रिक, चतुष्क, चत्वर यावत् राजमार्ग में अनेक जन परस्पर में इस प्रकार बात चीत करने लगे ( एवं खलु सुए परिवायए इह हव्यमागए जाव विहरइ) बंधुओ! शुक नाम का परिव्राजक इस अपनी सौगंधिका नगरी में अभी २ आया है ।- वह सांख्य सिद्धान्त के अनुसार अपनी प्रवृत्ति रखता हुआ परिव्राजका श्रम में ठहरा हुआ है। इस बात से परिचित होकर (परिसा निग्गया, सुदसणो, निग्गए, तएणं से सुए परिवायए तीसे परिसाए सुदंसणस्स સૌગાધિકાનગરી હતી અને જ્યાં પરિવ્રાજકોને આશ્રમ હતું ત્યાં આવ્યું. (उवागच्छित्ता परिवायगावसहसि भंडगनिक्खेव करेइ, करिता संख सभणेण अप्पाण भावेमाणे विहरइ) ते परिजन श्रममा ५डांयीन तने પિતાની બધી વસ્તુઓ મૂકી દીધી અને ત્યાં સાં સિદ્ધાન્તને અનુસરીને घाताना मने प्रया२ ४२ २२वा ये(तएण सोगंधियाए नयरीए सिंघाडगतिगचउक्कचच्चरेसु बहुजणो अन्नमन्नस्स एवमाइक्खइ) त्या२।६ सौगધિકા નગરીમાં શૃંગાટક, ત્રિક, ચતુષ્ક ચત્વર અને રાજમાર્ગમાં ઘણા માણસે मारीत वात४२वा साया-(एवं खलु सुए परिव्वायए इह हव्वमागए जाव विहरइ ) भित्र ! मा५५ २ नगरीमा शु४ नामे मे परिवार હમણાં જ આવ્યું છે. સાંખ્ય સિદ્ધાંત અનુસાર તે પોતાની પ્રવૃત્તિઓ આચર तो परिमा४४ आश्रममा यो छे. मा पातनी any edin (परिसा શ્રી જ્ઞાતાધર્મ કથાંગ સૂત્રઃ ૦૨
SR No.006333
Book TitleAgam 06 Ang 06 Gnatadharma Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages846
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_gyatadharmkatha
File Size47 MB
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