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________________ ५६४ भगवतीसूत्रे मनुष्यवानव्यन्तरज्योतिष्कपर्यन्तानां संग्रहो भवतीति 'अणंता सिद्धा' अनन्ताः सिद्धाः ये खजु सिद्धजीस्ते अप्पनन्नाः सन्तीति भावः ‘से तेणढे जाव अणता' तन् तेनार्थेन यावदनन्ताः अत्र यावत्पदेन तत्तेनार्थेन एवमुच्यते गौतम ! जीवद्रव्याणि नो संख्यातानि नो असंख्यातानि, एतेषां संग्रहो भवतीति । नैरयिकादारभ्य वायुकायिकान्ता जीवा असंख्याता भवन्ति द्वीन्द्रियादारभ्य वैमानिकदेवपयन्त जीवा असंख्याता भवन्ति, वनस्पतिकायिकाः सिद्धाश्चानन्ता भवन्ति, अनेन कारणेन कथ्यते यत् सामान्यतो जीवद्रव्याणि नो संख्यातानि तथा नो असंख्या. तानि, अपि तु अनन्तानि भवन्तीति' ॥मू०१॥ द्रव्याधिकारादेव इदमाह-'जी पदबा णं भंते' इत्यादि। __ मूलम्-जीवदव्वाणं भंते ! अजीवदव्वा परिभोगत्ताए हव्वमागच्छति ? अजीवदव्वाणं जीवदव्या परिभोगत्ताए हव्वमागच्छंति ? गोयमा! जीवदव्वाणं अजीवदव्वा परिभोगत्ताए वैमानिक देव असंख्यात हैं। यहां यावत्पद से त्रीन्द्रिय चौइन्द्रिय, पश्चेन्द्रिय तिर्थग्योनिक, मनुष्य, वानव्यन्तर और ज्योतिष्क इन सब का संग्रह हुआ है ! अणंता सिद्धा' तथा जो सिद्ध जीव हैं वे भी अनन्त है। 'से तेणटेणं जाव अणता' इस कारण हे गौतम! मैंने ऐसा कहा है-कि जीव द्रव्य संख्यात नहीं हैं, असंख्यात नहीं हैं किन्तु अनन्त हैं। नैरयिक से लेकर वायुकायिक तक के जीव असंख्यात हैं। दीन्द्रिय से लेकर वैमानिक तक के भी जीव असंख्यात हैं। परन्तु वनस्पतिकायिक और सिद्ध जीव अनन्त हैं। इसी कारण को लेकर सामान्य से ऐसा कहा गया है कि जीव द्रव्य संख्यात असंख्यात नहीं हैं किन्तु अनन्त हैं ।सू०१॥ વૈમાનિક દેવ અસંખ્યાત છે. અહિયાં યાંવત્ પદથી ત્રાદ્રિય ચૌઈદ્રિય, પંચેન્દ્રિય, તિર્યંચનિક, મનુષ્ય ભવનપતિ, વાનવ્યન્તર અને તિષ્ક આ अधाना स थये। छ. 'अणंता सिद्धा' तथा २ सिद्ध ! छ, तमा ५५ अनंत छ. 'से तेणद्वेणं जाव अणंता' ते ॥२४थी 3 गौतम ! में मे घुछ 8- द्रव्य सज्यात नथी, असभ्यात नथी, पर मनात छे. नथि. કથી લઈને વાયુકાયિક સુધીના છ અસંખ્યાત છે. બે ઈન્દ્રિયોથી લઈને પમાનિક સુધીના છ પણ અસંખ્યાત છે. પરંતુ વનસ્પતિકાયિક અને સિદ્ધ છ અનંત છે. આ કારણથી સામાન્યપણાથી એવું કહ્યું છે કે-જીવદ્રવ્ય સંખ્યાત કે અસંખ્યાત નથી. પરંતુ અનંત છે. તેમ સમજવું સૂત્ર ૧ શ્રી ભગવતી સૂત્ર: ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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