SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 498
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ४८३ 9 प्रमेयचन्द्रिका टीका श०२४ उ. २४ सू०१ सौधर्मदेवोत्पत्तिनिरूपणम् पल्योपमायुकाः तिर्यग्योनिकाः सुषमांशोद्भवाः क्षुद्रतरकाया स्तानपेक्षयेदमुक्तम् । 'उकोसेणं सातिरेगा' दो गाउबाई' उत्कर्षेण सातिरेके द्वे गव्यूते, यत्र काले सातिरेकव्यूतपाणा मनुष्या भवन्ति तत्कालोत्पन्नान् हस्त्यादीनपेक्ष्येदमुक्त - मिति । 'सेसं तहेय' शेषं तथैव पूर्वप्रतिपादितमेव अन्यत्सर्वमवगन्तव्यमिति ९ । 'असंखेज्जवासा उपसन्निमणुसस्स वि तदेव ठिई जहा पंचिदियतिरिक्खजोणियस्स असंखेज्जवासाउपस्स' असंख्येय वर्षायुष्कसंज्ञिमनुष्यस्यापि तथैव स्थिति यथा पञ्चेन्द्रियतिर्यग्योनिकस्य संख्यातवर्षायुष्कस्य असंख्यातवर्षायुष्कस्य पञ्चेन्द्रिय निर्यग्योनिकस्य स्थितिर्दर्शिता तथैवासंख्यातवर्षायुष्कस्य संज्ञिमनुष्यस्यापि स्थितिर्निरूपणीया इति भावः । 'ओगाहगा वि जेसु ठाणेस गाउयं, तेसु ठाणेसु इहं सातिरेगं गाउयं' शरीरावगाहना सौधर्मदेवाधिकारे येषु स्थानेषु असंख्यात - की आयु वाले हैं और सुवमांश में उत्पन्न हुए हैं। 'उश्कोसे सातिरेगा दो गाउयाई' तथा उत्कृष्ट से सातिरेक दो गब्यून की है। जिस काल में सातिरेक गच्यून प्रमाण मनुष्य होते हैं उस काल में उत्पन्न हुए हस्त्यादिकों की अपेक्षा करके यह अवगाहना का प्रमाण कहा गया है । 'सेसं तहेव' इस कथन के सिवाय ओर सब द्वारों का कथन पूर्व में जैसा कहा गया है वैसा ही है | ९| 'असंखेज्जवासाउय सन्निमणुसस्स वि तहेव ठिई जहा पंचिदिपतिरि क्खजोणियरस असंखेज्जवासाउपस्स' तथा असंख्यातवर्ष की आयुवाले संज्ञी मनुष्य की स्थिति असंख्यातवर्ष की आयुवाले पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिक की स्थिति के जैसी है । 'ओगाहणा वि जेसु ठाणेसु गाउयं ते ठाणेसु इहं सातिरेगं गाउयं' सौधर्मदेवाधिकार में - यस्योपभनी आयुष्यवाजा छे, भने सुषमांशमां उत्पन्न थाय छे. 'उक्लेसेण सातिरेगाइ दो गाउयाइ" तथा उत्कृष्टथी सातिरेङ मे गव्यूत (भाई)नी છે. જે કાળમાં સાતિરેક ગદ્યૂત પ્રમાણુ મનુષ્ય છે, એ કાળમાં ઉત્પન્ન થયેલા हाथी विगेरेनी अपेक्षा उरीने मा अगाडुनातु प्रमाणु अद्दु छे. 'सेंस तहेब' આ કથન શિવાય બીજા તમામ દ્વારા સ`ખ'ધી કથન પહેલાં જે રીતે કહેલ छे, मेन प्रमाणे छे 'अस' खेज्जवासाउयसन्निमणुसस्त्र वि तहेव ठिई जहा पंचिदियतिरिक्खजोणियम्स अबखेज्जवासाजयहस' तथा असंख्यात वर्षांनी आयुष्यवाजा સંજ્ઞી મનુષ્યની સ્થિતિ અસંખ્યાતવર્ષની આયુષ્યવાળા પાંચેન્દ્રિયતિય ચ योनिङनी स्थिति प्रभावे छे. 'ओगाहणा वि जेसु ठाणे इह ं सातिरेगं गाउयं' सौधर्म हेवना अधिारमां के स्थानामा શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫ गाउयं तेसु ठाणेसु सात वर्षांनी
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy