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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०२४ उ.२१ सू०२ आनतादिदेवेभ्यः मनुष्येषूत्पत्तिः ३९१ देवेषु स्थित्यंशे भेदं दर्शयन्नाह - 'पाणयदेवस्स' इत्यादि । 'पाणयदेवस्त ठिई वि गुणिया सहि सागरोवमा" प्राणत देवस्य स्थितिस्त्रिगुणिता षष्टिः सागरोपमाणि, प्राणतदेवस्य या उत्कृष्टा स्थितिः विंशतिसागरोपमा, सा कालादेशेन काय संवेधेदेवभवत्रयमाश्रित्य त्रिगुणिता षष्टि सागरोपमा भवतीति । 'आरणगस्स ते हिं सागरोमाई' आरणदेवस्य स्थितिः त्रिषष्टिः सागरोपमाणि, आरण देवस्योत्कृष्टा स्थितिरेकविंशतिसागरोपमा, सा कालादेशेन कायसंवेधे देवभवत्रयमाश्रित्य त्रिगुणिता त्रिषष्टिसागरोपमा भवति । 'अच्चुयदेवस्स छाबडिं सागरोवमाई " अच्युतदेवस्य स्थितिः षट्षष्टिः सागरोपमाणि भवति, अच्युत देवस्योत्कृष्टा स्थिति द्वविंशतिसागरोपमा, सा कायसंवेधे देवभवत्रयमपेक्ष्य त्रिगुणिता षट्षष्टिसागरोपमा भवतीत्येवं क्रमेण आनतदेवलोकादारभ्य अच्युतदेवलोक पर्यन्तानां कालादेशेन कायसंवेधे वैलक्षण्यं भवतीति । सूत्रकार इस सूत्र को कह कर यह समझा रहे हैं कि प्राणतदेव की जो २० सागरोपम की उत्कृष्ट स्थिति है वह कायसंवेध में काल की अपेक्षा देव के तीन भव को आश्रित करके तिगुनी करने से ६० सागरोपम की होती है । 'आरणगस्स तेवट्ठि सागरोवमाई' आरणदेव की उत्कृष्टस्थिति २१ सागरोपम की है सो वह काल की अपेक्षा कायसंवेध में देव के तीन भवों आश्रित करके तिगुनी करने पर ६३ सागरोपम की हो जाती है 'अच्चुयदेवस्स छावट्ठि सागरोवमहं 'अच्युतदेव की उत्कृष्ट स्थिति २२ मागरोपम की है, सो वह कायसंवेध में तीन भव को लेकर तिगुनी करने पर ६६ छासठ सागरोपम की हो जाती है । इस प्रकार से आनतदेवलोक से लेकर अच्युत देवलोक तक के देवों के काल की अपेक्षा काय संवेध में विलक्षणता आती है । सठ सागरोवमाई' सूत्रार या सूत्रश्री से समजावे छे -प्राशुतहेवनी ૨૦ વીસ સાગરોપમની ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ કહી છે તે કાયસ વેધમાં કાળની અપેક્ષાથી એ દેવના ત્રણ ભવાના આશ્રય કરીને ત્રણગણી કરવાથી ૬૦ સાઇડ સાગરોપभनी थर्ध लय छे. 'आरणगस्स तेवट्ठि सागरोपमाई' मारण हेवनी उत्सृष्ट સ્થિતિ ૨૧ એકવીસ સાગરાપમની છે. તેા તે કાળની અપેક્ષાથી કાયસ વેધમાં દેવના ત્રણ ભવના આશ્રય કરીને ત્રણ ગણી કરવાથી ૬૩ ત્રેસઠ સાગचमनी थर्ध लय हो, 'अच्चुयदेवस्स छावट्ठि सागरोवमाइ " अभ्युत हेवनी ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ ૨૨ ખાવીસ સાગરે પમની છે. તે તે કાયસ વેધમાં ત્રણ ભવના લઈને ત્રણ ગણી કરવાથી ૬૬ છાસઠ સાગરોપમની થઇ लय छे. આ રીતે આનતદેવ લેાકથી લઇને અચ્યુત દેવ લેાક સુધીના દેવાના ક્રાયસ”વેધમાં કાળની અપેક્ષાથી જુદાપણું આવે છે. શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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