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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श०२४ उ.२१ सू०१ मनुष्याणामुत्पत्तिनिरूपणम् ३७९ सागरोपमा भवतीति । 'बंभलोए चत्तालीसं' ब्रह्मलोके चत्वारिंशद् ब्रह्मलोक देवानां स्थिति श्चत्वारिंशत् सागरोपमा भवतीत्यर्थः । 'लंतए छप्पन्न' लान्तके षट् पश्चाशत् लान्तकदेवानां स्थितिः षट्पञ्चाशत्सागरोपमा भवतीत्यर्थः । 'महामुक्के अट्ठसहि' महाशुक्रे अष्टषष्टिः अष्टपष्टिसागरोपमा स्थितिः, महाशुक्रदेवानां भातीति भावः 'सहस्सारे बाबत्तरि सागरोवमाई' सहस्रारे' द्वासप्ततिसागरोपमाणि द्वासप्रतिसागरोपमममिता स्थितिर्भवति सहस्रारदेवानामिति । 'एसा उक्कोसा ठिई भाणियब्बा' एषा अनन्तरपूर्वोदीरिता स्थितिरुत्कृष्टा मणितव्या सनत्कुमारादीना. मिति 'जहन्नठिई पि चउगुणेना' जघन्यस्थितिमपि चतुर्मिणयेत्-चतुर्गुणा कतव्या, इत्यर्थः, यदा औधिकेभ्य उत्कृष्टस्थितिकेभ्यो देवेभ्य औधिकादि मनुः ज्येषत्पद्यते तदोत्कृष्टस्थितिर्भवति सा चोत्कृष्ट संवेधविवक्षायां चतुभिर्मनुष्यमवैः स्थिति हो जाती है। भलोए चत्तालीसं' ब्रह्मदेवलोक में ब्रह्मलोकदेवों की चालीस ४० सागरोपम की स्थिति हो जाती है। 'लतए छप्पन' लान्तक में लान्तकदेवों की ५६ छप्पन सागरोपम की स्थिति हो जाती है । 'महासुरके अहप्ताहि' महाशुक्र में महाशुक देवों की ६८ अडसठ सागरोपम की स्थिति हो जाती है । 'सहस्सारे बावत्तरि सागरोवमाई' 'सहस्रार में सहस्रार देवों की ७२ बहत्तर सागरोपम को स्थिति हो जाती है। 'एमा उक्कोसा ठिई भाणियव्वा' यह जो सनस्कु मार आदि देवों की स्थिति कही गई है वह उनकी उत्कृष्ट स्थिति कही गई है। 'जहन्नठिई पि च उगुणेज्जा' तथा जघन्यस्थिति को भी चौगुनी कर लेना चाहिये। जब औधिक उत्कृष्ट स्थिति वाले देवो से आकरके औधिक आदि मनुष्यों में जीव उत्पन्न होता है तब उत्कृष्ट सारा५मनी आयुष्य स्थिति ही छे. 'बंभलोए चत्तालीसं' U i Haas हवानी मायुष्य स्थिति ४० याणीस सागरामनी छे. लंतए छप्पन्न airds દેવલેકમાં લાન્તક દેવેની આયુષ્ય સ્થિતિ ૫૬ છપ્પન સાગરોપમની છે. 'महासुके असटुिं' भाशु विमानमा माशु वानी भायुष्य स्थिति ६८ 438 सागरापभनी छे. 'सहस्सारे बाबत्तरि सागरोवमाई' सवार हेक्सा. કમાં સહસ્ત્રાર દેવોની આયુષ્ય સ્થિતિ ૭૨ તેર સાગરોપમની કહી છે. 'एमा उक्कोसा ठिई भाणियव्वा' २ मा सनमार विगैरे वानी स्थिति डेवामा भावी छे, ते तमानी Se स्थिति मतापी छ. 'जहन्नदिई पि चउ. गुणेन्जा' त सधन्य स्थितिन पर यार यी ४२ ४३वी . - ઓધિક ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિવાળા માંથી આવીને ઔધિક વિગેરે મનબેમાં જીવ ઉત્પન્ન થાય છે, ત્યારે ઉત્કૃષ્ટ સ્થિતિ હોય છે. અને તે ઉત્કૃષ્ટપણું શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૫
SR No.006329
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 15 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages969
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size57 MB
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