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________________ ४८६ भगवतीसूत्रे निकः जघन्यकालस्थितिकनैरयिकेषु समुत्पन्नो भवेत् 'सच्चेव लद्धी संवेहो कि तहेव सत्तमगमसरिसो' सेव लब्धिः संवेधोऽपि तथैव सप्तगमसदृशः, एतत्मकरणस्य सप्तमगमवदेव सर्वत्रापि वक्तव्यमित्यष्टमो गमः ८। 'सो चेत्र उक्कोसकाळलिइरसु उनवन्न' स एन स्वयमुत्कृष्टकालस्थितिकः संज्ञिपश्चेन्द्रियतिर्यग्योनिको जीवः उत्कृष्टकालस्थितिकसप्तमपृथिवीसंबन्धिरयिकरूपेण उत्पन्नः 'एस चेव लद्धी जार अणुबंधो त्ति' एषैव लद्धिर्यावदनुबन्ध इति एषा-पूर्वोक्तैव वक्तव्यता अनुबन्धपर्यन्ता सर्वापि इहवक्तव्येति । 'भवादेसेणं जहन्नेणं तिन्नि भवग्गहणाई' भवादेशेन-भवमकारेण भवापेक्षयेत्यर्थः त्रीणि भवग्रहणानि, 'उक्कोसेण पंचभवगहणाई' उत्कर्षेण पञ्चभवग्रहणानि भरद्वयं मत्स्यस्य, भवमानं नारकस्येत्येवं जघन्येन भवत्रयं भवतीति । उत्कृष्टतो भवत्रयं मत्स्यस्य, भवद्वयं च नारकस्य पञ्चन्द्रिय तिर्यग्योनिक जीव जयन्य काल की स्थिति वाले सातवीं पृथिवी के नैरपिकों में उत्पन्न होने के योग्य है-तो 'सच्चेव लद्धी संवेहो वि तहेव सत्तमगमस रिसो'यहाँ पर वही लब्धि और संवेध सातवें गमक के जैसा कह लेना चाहिये । ऐसा यह आठवां गम है। यदि-'सो चेव उक्कोसकालहिएप्सु उववन्नो' वही उत्कृष्ट काल की स्थितिवाला संज्ञी पञ्चेन्द्रिय तिर्यग्योनिक जीव उत्कृष्ट काल की स्थिति वाले सप्तम पृथिवी के नैरयिक रूप से उत्पन्न होता है तो यहां पर 'एस चेव लद्धी जाव अणुबंधोत्ति' यही पूर्वोक्त वक्तव्यता सब यावत् अनुषन्ध तक कह लेनी चाहिये, 'भवादेसेणं जहन्नेणं तिनिभवगहणाई' भव की अपेक्षा यहाँ जघन्य से तीन भवों को ग्रहण करने तक और 'उकोसेणं पंचभरगहणाई' उत्कृष्ट से पाँच भवों को ग्रहण स्थितिवामी सतभी पृथ्वीना नैरपि भां 4-1 याने ये२५ जाय तो 'सच्चेव लद्धी संवेहो वि तहेव सत्तमगम भरिसो' माडियां मे४ सय भने सवेध સાતમા ગમ પ્રમાણે કહેવા જોઈએ આ પ્રમાણે આ આઠમે ગમ છે. ૮ જે 'सो चेव उक्कासकालटिइएसु उववन्नो०' ४८ ४गनी स्थिति मेवात સંશી પંચેન્દ્રિય તિર્યંચ યે નિ વળે જીવ ઉત્કૃષ્ટ કાળની સ્થિતિવાળા સાતમી Yीना नैथि: ३५ 3५-1 थाय छे. तो मडियां 'एस चेव लद्धी जाव अणुबंधोत्ति' 20 पूर्वोत तमाम ४थन यार मर्नुम सुपी डी . 'भवादे. सेणं जहण्णेणं तिम्नि भवाहणाई' अपनी मपेक्षाथी मलियां न्यथा त्रय भवाने अ५ ४२ता सुधी भने 'उकासेणं पंचभवरगहणाई' G४८यी पाथ શ્રી ભગવતી સૂત્ર: ૧૪
SR No.006328
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 14 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1970
Total Pages671
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size40 MB
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