SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 238
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २२४ भगवतीस्त्रे द्रव्याणि वर्णतः कृष्णनीललोहितपीतशुक्लरूपवन्ति, तथा गन्धतः सुगन्धीनि दुर्गन्धीनि, रसतः दिक्तकटुकषायाम्लधुरवन्ति, स्पर्शतः कर्कशमृदुगुरुलघुशीतोष्ण स्निग्धरूक्षाणि अन्योन्यसम्बद्धेत्यादि विशेषणवन्ति तिष्ठन्ति किम् ? इति प्रश्नः, भगवानाह-एवं चेव' एवमेव रत्नप्रभातम्यन्धिद्रव्यमेन स्वीकारात्मकमुत्तरम् ‘एवं जाव इसीपब्भाराए पुढवीर' एवं यावत् ईषत् पाग्मारायाः पृथिव्याः विषयेऽपि सर्वमेव प्रश्नोत्तरादिक ज्ञेयम् । 'सेवं भंते ! सेवं भंते ! जाब विहरइ तदेवं भदन्त ! तदेवं भदन्त ! यावद्विहरति हे भदन्त ! रत्नप्रभादिपृथिवीसम्बन्धिद्रव्यविषये यत् देवाणुप्रियेण कथितम् तत् सर्वमेव सर्वथा सत्यमेव आमवाक्यस्य सर्वथा प्रमाणस्वादिति । एवं कथयित्वा यावन्नमस्कार कृत्वा संयमेन तपसा आत्मानं भावयन् कप्पस अहे' हे भदन्त ! सौधर्मकल्प के नीचे कृष्णनीलादि वर्णवाले सुरभिदुरभि गंधवाले तिक्त कटु आदि रसवाले एवं कर्कश, मृदु आदि स्पर्शाले द्रव्य अन्योन्य संबद्ध आदि विशेषणों वाले हैं क्या ? उत्तर में प्रभु कहते हैं। 'एवं चेव' जैसा उत्तर रत्नप्रभा पृथिवी के नीचे रहे हुए द्रव्यों को स्वीकृति के रूप में दिया गया है वैसा ही उत्तर यहां पर भी जानना चाहिये । 'एवं जाव ईसीपभाराए पुढ वीए' इसी प्रकार का कथन यावत् ईषस्मारभारा पृथिवी के विषय में भी कर लेना चाहिये। अर्थात् पूर्वोक्त रूपसे प्रश्न और पूर्वोक्त से ही उत्तर जानना चाहिये। 'सेवं भंते! सेवं भते ! जाव विहरई' हे भदन्त ! रत्नप्रभापृथिवी आदि के सम्बन्धी द्रव्य के विषय से जो आप देवोनुप्रिय ने कहा है वह सब ही आप्तवाक्य को सर्वथा प्रमाणभूत होने के कारण सत्य ही है सोहम्मत कप्पस्स अहे" हे मापन सौधम ४६५नी नीय अ-नla A. વર્ણવાળા સુગંધ અને દુર્ગંધવાળા, તીખા, કડવા, વિગેરે રસોવાળા અને કઠોર, મૃદુ-કમળ વિગેરે સ્પર્શીવાળા દ્રવ્યો પરસ્પરનાં સંબંધિત રીતે છે? ॥ प्रश्न उत्तरमा प्रभु ४ छे , “एवं चेव” २त्नमा पृश्वीनी नाये રહેલા દ્રવ્યોના સ્વીકાર કરવામાં જે પ્રમાણેને ઉત્તર આપે છે, તેજ प्रभागेन। उत्तर भाडयां ५ सभा 1. "एवं जाव ईसीपब्भाराए पुढवीए" આજ પ્રમાણેનું કથન યાવત્ ઈષત્ પ્રામ્ભારા પૃથ્વીના સંબંધમાં પણ સમજી લેવું. અર્થાત્ પૂર્વોક્ત પ્રકારે પ્રશ્ન વાક્ય અને ઉત્તર વાક્ય સમજી લેવા सेव भंते ! सेव भंते ! जाव विदरइ” ले सन् २नमा पृथ्वी વિગેરેમાં રહેલા દ્રવ્યોના સંબંધમાં આપ દેવાનુપ્રિયે જે કહ્યું છે, તે આત વાકય હોવાથી સર્વથા સત્ય જ છે. આપનું કથન પ્રમાણરૂપ હોવાથી યથાર્થ શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૩
SR No.006327
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 13 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1969
Total Pages970
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size58 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy