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________________ - ६२८ भगवतीसूत्रे एवं-तथैव, अद्धासमयैरपि स्यात्-कदाचित् समयक्षेत्रापेक्षया स्पृष्टो भवति , स्यात्-कदाचित् बहिःक्षेत्रापेक्षया नो स्पृष्टो भवति, तत्रापि यदा स्पृष्टो भवति तदा नियमात् अनन्तैः अद्धासमयः एक आकाशास्तिकायप्रदेशः स्पृष्टो भवति ६, गौतमः पृच्छति-'एगे भंते ! जीवास्तिकायपएसे केवइएहिंधम्मत्थिकायपएसेहि पुढे ? पुच्छा' हे भदन्त ! एकः खलु जीवास्तिकायप्रदेशः कियद्भिः धर्मास्तिकायप्रदेशैः स्पृष्टः ? इति पृच्छा, भगवानाह-'जहन्नपदे चउहि, उक्कोसपए सत्तर्हि' हे गौतम ! जघन्यपदे-जघन्येन चतुर्भिः धर्मास्तिकायप्रदेशः, उत्कृष्टपदेप्रकार से आकाशास्तिकाय का एकप्रदेश अद्धासमयां द्वारा भी कदाचित् स्पृष्ट होता है और कदाचित् स्पृष्ट नहीं होता है। यदि वह इनके द्वारा स्पृष्ट होता है तो तो नियम से वह अनन्त अद्धासमयों द्वारा स्पृष्ट होता है। इस कथन का तात्पर्य ऐसा है कि अद्धासमय का सद्भाव ढाईद्वीप में ही माना गया है इसके बाहिर नहीं। यहां जो ऐसा कहा गया है कि आकाशास्तिकाय का एकप्रदेश अद्धासमयों द्वारा कदाचित् स्पृष्ट होता है-सो यह कथन समयक्षेत्रकी अपेक्षा से किया गया है। बहिःक्षेत्र की अपेक्षा से नहीं । बहिःक्षेत्र की अपेक्षा से तो 'कदाचित् वह इनके द्वारा स्पष्ट नहीं होता है' यह किया गया है।६। अब गौतमस्वामी प्रभु से ऐसा पूछते हैं-'एगे भंते ! जीवस्थिकायपएसे केवइएहिं धम्मस्थिकायपएसेहिं पुढे पुच्छा' हे भदन्त ! जीवास्तिकाय का एकप्रदेश धर्मास्तिकाय के कितने प्रदेशों द्वारा स्पृष्ट होता है ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं-'जहन्नपए चउहि, उक्कोसपए અદ્ધાસમ વડે સ્પષ્ટ થાય છે અને કયારેક તેમના વડે પૃષ્ટ થતું નથી. જે તેમની સાથે પૃષ્ટ થાય તે નિયમથી જ અનંત અદ્ધાસમ વડે સ્પષ્ટ થાય છે. આ પ્રકારના કથનનું કારણ એ છે કે–અદ્ધાસમયને સદ્ભાવ અઢીદ્વીપમાં જ હોય છે, તેની બહારના ક્ષેત્રમાં હોતો નથી. “આકાશક્તિકાયને પ્રદેશ ક્યારેક અદ્ધાસમ વડે પૃષ્ટ થાય છે.” આ કથન સમયક્ષેત્રની અપેક્ષાએ કરવામાં આવ્યું છે. “આકાશાસ્તિકાયને એક પ્રદેશ કયારેક અદ્ધાસમ વડે સ્પષ્ટ થતું નથી,” આ કથન સમયક્ષેત્ર (અઢી દ્વીપ)ની બહારના ક્ષેત્રોની અપેક્ષાએ કરવામાં આવ્યું છે. ___गौतम स्वाभानी प्रश्न-" एगे भंते ! जीवत्थिकायपरसे केवइएहि धम्मस्थिकायपएसेहि पुढे पुच्छा” 8 सन् ! तियनो मे प्रदेश ४८ ધર્માસ્તિકાયપ્રદેશ દ્વારા સ્પષ્ટ થાય છે? શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૧૦
SR No.006324
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 10 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages735
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size43 MB
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