SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 442
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ૪૩૮ भगवती सूत्रे आसप्तमोऽपि - सप्तमपुरुषपर्यन्तोऽपि कुलवंशः कुलरूपो वंशः महीणो भवति, किन्तु नोचैत्र- नैव खलु ते देवाः लोकान्तं संप्राप्नुवन्ति, 'तपणं तस्स दारगस्स नामगोत्र पहीणे भवइ, णो चेव णं ते देवा लोगंतं संपाउणंति' ततः खलु तस्य दारकस्य - बालकस्य नामगोत्रमपि प्रहीणं - नष्टं भवति, तथापि नो चैव नैव खलु ते देवाः लोकान्तं संप्राप्नुवन्ति, ' तेसि णं भंते ! देवाणं किं गए बहुए, अगए बहुए ?' गौतमः पृच्छति - हे भदन्त । तेषां खलु पूर्वोक्तानां षट्सु दिक्षु प्रयातानां देवानां किं गतं - व्यतिक्रान्तं क्षेत्रम् बहुकम् अधिकं भवति ? किंवा अगतम् - अव्यतिक्रान्तं क्षेत्रं बहुकम् - अधिकं भवति ? भगवानाह - 'गोयमा ! गए बहुए, णो अगए बहुए' हे गौतम! तेषां देवानां गतं - व्यतिक्रान्तं क्षेत्र बहुकम् अधिकं लोक के अन्त को नहीं पा सकते हैं। 'तरणं तस्स दारगस्स नामगोए वि पहीणे भवइ - णोचेव णं ते देवा लोगंतं संपाउणंति' यहाँ तक कि इस बालक का नामगोत्र भी नष्ट हो जाय तबतक भी वे देव चलते २ लोक का अन्त नहीं पा सकते हैं। ऐसा बडा यह लोक है. । अब गौतम प्रभु से पूछते हैं-'तेसिंणं भंते! देवाणं किं गए बहुए, अगए बहुए ' हे भदन्त ! छहों दिशाओं में गये हुए उन देवों का व्यतिक्रान्त - पार किया जा चुका क्षेत्र बहुत है ? या नहीं पार किया गयाजिसे पार करना बाकी है - ऐसे क्षेत्र बहुत हैं ? इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं - 'गोयमा ! गए बहुए णो अगए गौतम! जितना क्षेत्र देवों ने पार कर लिया है वह क्षेत्र बहुए' हे बहुत है, और जिसे अभी हांथी शता नथी. "तएणं सरस दारगस्स नामगोए वि पहीणे भवइ, " णो चेवण' ते देवा लोगंत संपाउणंति " अरे । ते भावना नाम गोत्री પણ નાશ થઈ જાય છે, પરન્તુ આટલા દીર્ઘ કાળ પર્યન્ત મુસાફરી કરવા છતાં પણ તે દેવા લોકના અન્ત સુધી પહાંચી શકતા નથી, એટલેા પ્રધા વિશાળ આ લોક છે. गौतम स्वाभीनो प्रश्न- "रोसिंग भते ! देवाण किं गए बहुए, अगए चहुए १' हे लगवन् ! छमे हिशायामां गयेसा ते देवे। द्वारा उस धित (પાર કરાયેલુ) ક્ષેત્ર વધારે માટુ છે ? કે અનુલ્લંધિત (પાર કરવાનુ... જે બાકી છે) તે ક્ષેત્ર વધારે માટુ હાય છે ? महावीर अलुना उत्तर- " गोयमा ! गए बहुए, जो अगर बहुए " હું ગૌતમ ! દેવાએ જેટલું ક્ષેત્ર પાર કર્યુ છે–તેક્ષેત્ર અધિક છે અને જે પાર શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૯
SR No.006323
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 09 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages760
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size45 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy