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________________ अमेयचन्द्रिका टीका श. ८ उ. २ सू. ६ लब्धिस्वरूपनिरूपणम् ४०७ अज्ञानलब्धिः खलु त्रिविधा प्रज्ञप्ता, 'तंजहा-मइअन्नाणलद्धी, सुयअभाणलद्धी, विभंगनाणलद्धी' तद्यथा-मत्यज्ञानलब्धिः, श्रुताज्ञानलब्धिः, विभङ्गमानलब्धिः, । गौतमः पृच्छति- 'दसणलद्धी णं भंते! कइविहा पण्णत्ता' हे भदन्त ! दर्शनलब्धिः खलु कतिविधा प्रज्ञप्ता ? भगवानाह- 'गोयमा ! तिविहा पण्णत्ता' हे गौतम ! दर्शनलब्धिः खलु त्रिविधा प्रज्ञप्ता, 'तंजहा - सम्मइंसणलद्धी, मिच्छादसणलद्धी, सम्मामिच्छादसणलद्धी' तद्यथा - सम्यग्दर्शनलब्धिः, मिथ्यादर्शनलब्धिः, सम्यगमिथ्यादर्शनलब्धिः, तत्र मिथ्यात्वमोहनीय कर्मोपशम-क्षय-क्षयोपशमजन्यः श्रद्धानलक्षणः आत्मपरिणामः सम्यग्दर्शनलब्धिः, मिथ्यात्वपुद्गलदलिकवेदनसमुद्भवो विपर्यासरूपो जीवपरिणामो हे गौतम ! अज्ञानलब्धि तीन प्रकारकी कही गई है। जैसे'मइ अन्नाणलदी, सुय अन्नाणलद्धी, विभंगनाणलद्धी' मत्यज्ञानलब्धि, श्रुताज्ञानलब्धि और विभंगज्ञानलब्धि । अब गौतम स्वामी प्रभुसे ऐसा पूछते हैं- 'दंसणलद्धीणं भंते ! कइविहा पण्णत्ता' हे भदन्त ! दर्शनलब्धि कितने प्रकारकी कही गई है ? उत्तरमें प्रभु कहते हैं'तिविहा पण्णत्ता' हे गौतम! दर्शनलब्धि तीन प्रकारकी कही गई है'तंजहा' जैसे- 'सम्म दंसणलद्धी, मिच्छा दंसणलद्धी, सम्मामिच्छादसणलद्धो' सम्यकदर्शनलब्धि, मिथ्यादर्शनलब्धि, सम्यकमिथ्यादर्शनलब्धि इनमें- मिथ्यात्वमोहनीय कर्मके उपशमसे, क्षयसे, अथवा क्षयोपशमसे जन्य जो श्रद्धारूप आत्म-परिणाम प्राप्त होता है उसका नाम सम्यक् दर्शनलब्धि है। अशुद्ध मिथ्यात्व पुद्गलके दलिकके वेदनसे समुत्पन्न जो विपर्यासरूप जीव परिणाम होता है उसका नाम ४२नी वा छे भो ‘मइअन्नाणलद्धी विभंगनाणलद्धी' भत्यज्ञान - श्रुतज्ञान a मने qिuol यान - - 'दसणलद्धीणं भंते कइविहा पण्णत्ता भगवन! इन 21 प्रा२नी 'क्षी छ ! 6.- 'तिविहा पण्णत्ता' गौतम ! - elu am सनी छ. 'जहा' र 'सम्मदंसणलद्धी मिच्छादसण लद्धी सम्मामिच्छादसणलद्धी सम्प, ४शन बधि, भिय्यान सचि અને સમ્યગૂ મિયા દર્શન લબ્ધિ તેમાં મિથ્યાત્વ મેહનીય કર્મને ઉપશમથી, ક્ષયથી અથવા ક્ષયપામથી થવાવાળી શ્રદ્ધારૂપ આત્મપરિણામ પ્રાપ્ત થાય છે. તેનું નામ સમ્યગૂ દશન લબ્ધિ છે. અશુદ્ધ મિથ્યાત્વ પુદગલના દલિકેન વેદનથી ઉત્પન્ન થવાવાળું જે વિ૫ર્યાસ રૂપ જીવ પરિણામ રૂપ થાય છે. તેનું નાથ મિથ્યા દાન લબ્ધિ છે. અધ श्री. भगवती सूत्र :
SR No.006320
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 06 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1964
Total Pages823
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size46 MB
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