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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श.८. उ.२ मू. ५ ज्ञानभेदनिरूपणम् ३७७ केवलज्ञानलक्षणैकज्ञानिनः पूर्वप्रतिपादितास्तथा नोसक्ष्मा नोवादरा अपि जीवाःकेवलज्ञानलक्षणेकज्ञानिनो भवन्ति, न तु द्वयादिज्ञानिनः । अथ षष्ठं पर्याप्तकद्वारमाश्रित्य पृच्छति-पजत्ता णं भंते ! जीवा कि नाणी, अन्नाणी' हे भदन्त ! पर्याप्ताः खलु जीवाः किं ज्ञानिनो भवन्ति किंवा अज्ञानिनो भवन्ति, भगवानाह 'जहा-सकाइया' यथा सकायिका भजनया पञ्चज्ञानिनः व्यझानिनः प्रतिपादितास्तथा पर्याप्तका अपि भजनया पञ्चज्ञानिनो भवन्ति केवलिनापि पर्याप्तकतया पर्याप्तकानां सम्यग्दृशां भजनया एकद्वयादिज्ञानसंभवात्, मिथ्यादृशां पर्याप्तकानांतु भजनया त्रीणि अज्ञानानि भवन्ति, गौतमः पृच्छति'पज्जत्ता णं भंते ! नेरइया किं नाणी अन्नाणी हे भदन्त ! पर्याप्तकाः खलु प्रकारसे नोसूक्ष्म नोवादरजीव भी केवलज्ञानरूप एकज्ञानवाले ही होते हैं। दो आदिज्ञानवाले नहीं होते हैं । अब गौतमस्वामी छठे पर्याप्तद्वारको आश्रित करके प्रभुसे ऐसा पूछते हैं 'पजत्ता णं भंते ! जीवा किं नाणी, अन्नाणी' ? हे भदन्त ! जो पर्याप्तजीव हैं वे क्या ज्ञानी होते हैं या अज्ञानी होते हैं ? इसके उत्तरमें प्रभु कहते हैं 'जहा सकाइया' हे गौतम ! जिस प्रकार सका यिक जीवोंको भजनासे पांच ज्ञानवाला और तीन अज्ञानवाला कहा गया है उसी प्रकारसे पर्याप्तक जीव भी भजनासे पांचज्ञानवाले और तीन अज्ञानवाले होते हैं ऐसा जानना चाहिये । पर्याप्तक केवली भी होते हैं। इसलिये पर्यातक सम्यग्दृष्टियोंमें भजनासे एक, दो, तीन, आदि ज्ञान होते हैं तथा जो पर्याप्त जीव मिथ्यादृष्टि होते हैं उनके भजनासे तीन अज्ञान होते हैं। अब गौतमस्वामी प्रभुसे ऐसा पूछते हैं पज्जत्ता णं भंते ! नेरइया किनाणी अन्नाणी' हे भदन्त ! जो नारकતેજ રીતે ને સૂક્ષ્મ અને તે બાદર છવ પણ કેવળજ્ઞાનરૂપ એક જ્ઞાનવાળા હોય છે. બે આદિ જ્ઞાન તેમનામાં રહેતું નથી. गौतम स्वामी ७४ तिहारने होशीन प्रभुने पूछे छे 'पज्जत्ताणं भंते जीवा किं नाणी अन्नाणी? 3 महतले पर्याप्त ७१ डाय छ त तेशानी डाय मज्ञानी ? उत्तर जहा सकाइया' गौतम २ शत સકાઈક જીવને ભજનાથી પાંચ જ્ઞાનવાળા અને ત્રણ અજ્ઞાનવાળા કહ્યા છે. એ જ રીતે પર્યાપ્ત છવ પણ ભજનાથી પાંચ રાનવાળા અને ત્રણ અજ્ઞાનવાળા હોય છે. પર્યાપ્તક કેવળી પણ હોય છે. એટલા માટે પર્યાપ્તક સભ્યદ્રષ્ટિઓમાં ભજનાથી એક, બે, ત્રણ આદિ જ્ઞાન હોય છે. તથા જે પર્યાપ્તક જીવ મિશ્રાદષ્ટિ હોય છે. તેઓને ભજનાથી ११ मज्ञान हाय. प्रम:- 'पज्जत्ता णं भंते नेरइया कि नाणी अन्नाणी' श्री. भगवती सूत्र :
SR No.006320
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 06 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1964
Total Pages823
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size46 MB
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