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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श.८ उ.२ ख.५ ज्ञानभेदनिरूपणम् द्वयज्ञानिनः, अस्त्येकके व्यज्ञानिनः, एवं व्यज्ञानिनो भजनया । असुरकुमाराः खलु भदन्त ! किं ज्ञानिनः? अज्ञानिनः ? यथैव नैरयिकास्तथैव, त्रीणि ज्ञानानि नियमात्, त्रीणि अज्ञानानि भजनया, एवं यावत्-स्तनितकुमाराः, पृथिवीकायिकाः __'नेरइयाणं भंते ! किं नाणी, अन्नाणी' इत्यादि । सूत्रार्थ-(नेरइयाणं भंते ! किं नाणी ? अन्नाणी ?) हे भदन्त ! नैरयिक जीव ज्ञानी होते हैं कि अज्ञानी होते हैं (गोयमा) हे गौतम ! नारकजीव (नाणी वि, अन्नाणो वि) ज्ञानी भी होते हैं अज्ञानी भी होते हैं (जे नाणी ते नियमा तिन्नाणी) जो ज्ञानी होते हैं, वे नियमसे तीन ज्ञानवाले होते हैं । (तंजहा) जैसे (आभिणियोहियनाणी, सुयनाणी, ओहिनाणी) आभिनियोधिकज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान इनतीन ज्ञानवाले होते हैं (जे अन्नाणी ते अत्थेगइया दुअन्नाणी अत्थेगइया तिअन्नाणी) और जो अज्ञानी होते हैं वे कोई तो दो अज्ञानवाले होते हैं और कोई तीन अज्ञानवाले होते हैं । (एवं तिन्नि अन्नाणाणि भयणाए) इस तरह जो नैरयिक अज्ञानी होते हैं उनमें किसी २ नैरयिकोंको दो अज्ञान होते हैं और किसी २ नैरयिकोकों तीन अज्ञान होते हैं । (असुरकुमारा णं भंते ! किं नाणी, अण्णाणी) हे भदन्त ! असुरकुमार क्या ज्ञानी होते हैं या अज्ञानी होते हैं ? ( जहेव नेरइया तहेव तिन्नि नाणाणि नियमा) जैसा नैर'नेरइया णं भंते किं नाणी अन्नाणी इत्यादि । सूत्रार्थ- 'नेरहया णं भंते कि नाणी अन्नाणी' भगवन ! यि ७५ ज्ञानी होय छे । मज्ञानी ? 'गोयमा' हे गौतम! 'नाणी वि अन्नाणी वि। ना२४ यशानी मने मज्ञानी ५५ होय छे. 'जे नाणी ते नियमा तिन्नाणी' २शानी हाय छ त नियमयी त्र ज्ञानवाणा हाय छे. 'तंजहा' म 'आभिणिबोहियनाणी, मुयनाणी, ओहिनाणी' मालिनिमाधि ज्ञान श्रुतज्ञान भने अवधिसान को ज्ञान डाय छे. 'जे अन्नाणी ते अत्थेगइया अन्नाणी अत्थेगइया तिअन्नाणी' ने अज्ञानी हाय छत ही १४ मे २मशानवा मन डोर मज्ञानवाणा हाय छे. 'एवं तिन्नि अन्नाणाणि भयणाए' से शते मे २४ जानी હેય છે તેમાં કઈ કઈ નરયિકને બે અજ્ઞાન હોય છે અને કેઈઈને ત્રણ અજ્ઞાન હોય છે. 'अमुरकुमाराणं भंते किं नाणी अन्नाणी' हे भगवन ! मसुशुमार जानी राय छ । मज्ञानी ? 'जहेव नेरइया तहेव तिन्नि नाणाणि नियमा' या रीत ने यिना વિષયમાં કહેલ છે તે જ રીતે આના સંબંધમાં પણ સમજી લેવું. અર્થાત્ જે અસુરકુમાર श्री. भगवती सूत्र :
SR No.006320
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 06 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1964
Total Pages823
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size46 MB
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