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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीकाश. ३ उ. ६.१ मिथ्यादृष्टेरनगारस्य विकुर्वं णानिरूपणम् ७१९ गौतम ! नो तथाभाव जानाति, पश्यति, अन्यथाभावं जानाति, पश्यति, तत् केनार्थेन भदन्त ! एवम् उच्यते नो तथाभावं जानाति, पश्यति, अन्यथा - भावं जानाति, पश्यति ? गौतम ! तस्य एवं भवति एवं खलु अहं राजगृहे नगरे समवहतः, समवहत्य वाराणस्यां नगर्यां रूपाणि जानामि, पश्यामि तत् तस्य दर्शने विपर्यासो भवति, तत् तेनार्थेन यावत् - पश्यति, अनगारः खल्ल दृष्टि मायी-कषायवाला भावितात्मा अनगार वीर्यलब्धिसे, वैक्रियलब्धिसे, एव विभंगज्ञानलब्धिसे वाणारसी नगरीकी विकुर्वणा करके जो राजगृह नगर में रहता हुआ रूपोंको जानता है देखता है सो तथा भावसे वे जैसे हैं उन्हें उसीरूपसे - जानता है, देखता है कि अन्यथाभाव से जैसे वे नहीं हैं उसरूपसे जानता है ? (गोयमा ! पा तहाभाव जाणइ पासह, अण्णहाभाव जाणइ पासइ) हे गौतम ! तथाभाव से वह नहीं जानता है नहीं देखता है किन्तु अन्यथाभाव से जानता और देखता है । ( से केणद्वेण भंते ! एवं बुच्चइ-नो तहाभाव जाणइ पासह अन्नहाभाव जाणइ पासइ) हे भदन्त । ऐसा आप किस कारण से कहते हैं कि वह तथाभावसे नहीं जानता देखता है किन्तु अन्यथाभाव से जानता देखता है । (गोयमा ! तस्स णं एवं भवइ, एवं खलु अह रायगिहे नयरे समोहए, समोहणित्ता वाणारसीए नयरीए रुवाई जाणामि, पासामि से से दंसणे विवच्चासे भवइ, से तेणट्टेणं जाव पासइ) हे गौतम ! उसके मनमें ऐसा विचार श छे. ( से भंते ! किं तहाभावं जोणइ, पासइ, अन्नहाभावं जाणइ पासइ ? ) ભદન્ત ! તે પ્રકારની વિકુ′ણા કરીને રાજગૃહ નગરમાં રહેલા તે અણગાર તે પાને તથાભાવથી [જેવાં છે એવાં રૂપે જાણે અને દેખે છે, કે અન્યથાભાવથી જેવા નથી मेवां ३ये] भागे रमने हेथे छे ? गोयमा ! णो तहाभावं जाणेइ, पासइ, अण्णहाभाव जाणइ पासइ) हे गौतम 'तथा भावे' नहीं, य અન્યથા ભાવે' જાણે છે અને દેખે છે. ( તથાભાવ અને અન્યથાભાવના અથ ટીકા માં समलव्यो छे.) 6 - ( से केणटुणं भंते ! एवं बुवइ - नो तहाभावं जाणइ पासह अन्नहाभावं जाणइ पासइ) डे लहन्त ! श्रार साथ मे छोडे ते अगुगार ते उपने तथा लावे भगुतो हेमतो नथी पशु अन्यथा भावे लगे हेथे छे ? गोयमा ! तस्स णं एवं भवइ, एवं खलु अहं रायगिहे नयरे समोहए, समोहणित्ता वाणारसीए नयरीए रुवाई जाणामि, पासामि, से से दंसणे विवच्चासे भवइ, से तेणद्वेणं जाव पासइ) हे गौतम! तेना भनभां भेवा विचार थाय छे ! 'भे रामगृह नगर શ્રી ભગવતી સૂત્ર : ૩
SR No.006317
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages933
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size52 MB
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