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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श. ३. उ. १ सामानिकदेवद्धिविषयेभगवदुत्तरं ३१ छाया-गौतम ! चमरस्य असुरेन्द्रस्य, असुरराजस्य सामानिका देवाः महद्धिंकाः यावत्-महानुभागाः, ते खलु तत्र स्वेषां स्वेषां भवनानाम्, स्वेषां स्वेषां सामानिकानाम् स्वासां स्वासाम् अग्रमहिषीणाम्, यावत् दिव्यान् भोगभोगान् भुञ्जाना विहरन्ति, एवं महर्द्धिकाः, यावत्-एतावच्च खलु प्रभुर्वि कुर्वि तुम्, तद्यथानाम युवति युवा हस्तेन हस्ते गृह्णीयात्, चक्रस्य वा नाभिः अरकायुक्ता (उत्तासिता) स्यात्, एवमेव गौतम ! चमरस्य असुरेन्द्रस्य, असुरराजस्य एकैकः सामानिक गोयमा चमरस्स असुरिंदस्स' इत्यादि । सूत्रार्थ—(गोयमा) हे गौतम ! (असुरिंदस्स असुररण्णो चमरस्स) असुरेन्द्र असुरराज चमर के (सामाणिया देवा) सामानिक देव (महिडिया जाव महाणुभागा) बहुत ऋद्धिवाले हैं और यावत् बहुत बड़े प्रभावशाली हैं। (ते णं तत्थ साणं साणं भवणाणं, साणं साणं सामाणियाणं, साणं साणं अग्गमाहिसीणं जाव दिव्वाई भोगभोगाई-भुंजमाणा विहरंति) वे वहां पर अपने २ भवनों पर अपने २ सामनिक देवो के ऊपर, और अपनी २ पट्टरानियों के ऊपर सत्ताधीशत्व भोगते हुए यावत् दिव्य कामभोंगो को भोगते रहते हैं। (एवं महिडिया जाव एवइयं च णं पभू विउवित्तए) वे ऐसी महाऋद्धिवाले हैं तथा विक्रिया करने के लिये वे ऐसे समर्थ हैं कि (से जहानामए जुवतिं जुवाणे हत्थेणं हत्थे गेण्हेज्जा, चकस्स वा णाभी अरयाउत्तासिया) जैसे कोई युवा अपने हाथसे युवति स्त्री को उसका हाथ पकड़कर खेचलेता है अथवा चक्रकी नाभिमें जैसे अरक काष्ठ “गोयमा चमरस्स असुरिंदस्स" इत्यादि साथ-(गोयमा) 3 गौतम! (अमुरिंदस्स असुररण्णो चमरस्स) मसुरेन्द्र मसु२॥२४ यभरना (सामाणिया देवा) सामानि हे! (महडिया जाव महाणुभागा) म. ऋद्धि, धुति, , यश, सु५ मने प्रमाण छ. (तेणं तत्थ साणं साणं भवणाणं, साणं साणं सामाणियाणं, साणं साणं अग्गमहिसाणं जाव दिव्वाई भोगभोगाइं भुजमाणा विति) तया त्या पोत पातान भवन ५२, पोत પિતાના સામાનિક દેવે ઉપર તથા પિત પિતાની પટ્ટરાણીઓ ઉપર આધિપત્ય ભેગવે छ भने हिव्य मिल गया रे छे. (एवं महिडिया जाव एवइयं च णं पभ् विउण्वित्तए) तो मेटली मधी *द्विवाणा छ भने मेटली मधी विडिया ४२वाने शक्तिमान छ : (से जहा नामए जुवति जुवाणे हत्थेणं हत्थे गेण्हेज्जा, चक्कस्स वा णाभी अरया उत्ता सिया) २८ मे युवान पुरुष ४ યુવાન સ્ત્રીને હાથ પકડીને પોતાની તરફ ખેંચવાને સમર્થ હોય છે, અને ચક્રની નાભિ શ્રી ભગવતી સૂત્રઃ ૩
SR No.006317
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages933
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size52 MB
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