________________
66... पूजा विधि के रहस्यों की मूल्यवत्ता - मनोविज्ञान एवं अध्यात्म...
जा सकता है। इससे एक्युप्रेशर पॉइन्ट प्रभावित होते हैं एवं जीव का समग्र क्षेत्रों में विकास होता है।
मुद्रा त्रिक में रखने योग्य सावधानियाँ निम्नोक्त हैं
मनमर्जी अनुसार किसी भी मुद्रा में कोई भी सूत्र नहीं बोलना चाहिए। सूत्रोच्चारण करते हुए इधर-उधर घूमना, मैल उतारना, हाथों को मनचाही अवस्था में रखने से मुद्रा त्रिक का पालन नहीं होता ।
•
•
अविधिपूर्वक मुद्रा करने से उनका समुचित लाभ प्राप्त नहीं होता और न ही भावनात्मक एकाग्रता आती है।
10. प्रणिधान त्रिक
प्रणिधान का अर्थ है मन-वचन-काया की एकाग्रता या एकरूपता। एकाग्रता आराधना का मूल आधार है। किसी भी कार्य में तन्मयता एवं तल्लीनता होने पर ही उसकी संपूर्ण सिद्धि होती है। चैत्यवंदन आदि सूत्रों में मन-वचन-काया की एकाकारता को प्रणिधान त्रिक कहते हैं । मन-वचन-काया को अन्य विचारों से रिक्त कर देव गुरु-धर्म की भक्ति में स्थापित करना भी प्रणिधान कहलाता है। प्रणिधान त्रिक इस प्रकार है- 1. मन का प्रणिधान 2. वचन का प्रणिधान और 3. काया का प्रणिधान । 17
1. मन का प्रणिधान - जो क्रिया कर रहे हैं उसी में मन को स्थिर करना मन का प्रणिधान है।
2. वचन का प्रणिधान - जिस सूत्र का उच्चारण कर रहे हैं उसकी शैली, उच्चारण आदि को ध्यान में रखकर सूत्र बोलना वचन का प्रणिधान है।
3. काया का प्रणिधान - जिस मुद्रा में क्रिया करनी हो उस मुद्रा के अतिरिक्त शरीर की अन्य शुभ-अशुभ चेष्टाओं का त्याग करना काया का प्रणिधान है।
कुछ आचार्यों के अनुसार प्रणिधान के तीन प्रकार हैं- 1. चैत्यवंदन, 2. गुरुवंदन और 3. प्रार्थना ।
1. चैत्यवंदन प्रणिधान - जावंति चेइआई सूत्र के द्वारा तीनों लोकों में स्थित चैत्यों को वंदन करना चैत्यवंदन प्रणिधान कहलाता है।
2. गुरुवंदन प्रणिधान - जावंत केवि साहु सूत्र के द्वारा ढाई द्वीप में रहे हुए साधुओं को वंदन करना गुरुवंदन प्रणिधान कहलाता है।