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34...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता अर्हन्त और सिद्धों की प्रतिमाएँ विराजमान रहती हैं। इन स्तूपों पर वन्दनमालाएँ लटकी होती हैं। मकराकार तोरणद्वार होते हैं। छत्र लगे होते हैं, मंगल द्रव्य अंकित किए जाते हैं और ध्वजाएँ फहरती रहती हैं। यहाँ विराजमान जिन प्रतिमाओं का देवगण पूजन और अभिषेक करते हैं। ___भवनभूमि के आगे स्फटिक मणिमय चतुर्थ कोट आता है। इस कोट के गोपुर द्वारों पर कल्पवासी देव खड़े रहते हैं।
चतुर्थ कोट के आगे रत्न-स्तम्भों पर आधारित अन्तिम श्रीमण्डप- भूमि होती है। उस भूमि में स्फटिक मणिमय सोलह दीवारों से विभाजित बारह कोठे होते हैं। इन बारह कोठों में ही बारह गण अथवा बारह सभाएँ होती हैं। इनमें सर्वप्रथम अर्हत भगवान के दायें ओर के कोठे में गणधर देवादिक मुनि विराजते हैं। द्वितीय कोठे में कल्पवासिनी देवियाँ होती हैं, तीसरे कक्ष में आर्यिका एवं श्राविका समूह होता है। इसके आगे वीथि रहती है। वीथि के आगे चौथे, पाँचवें
और छठवें कोठे में क्रमश: ज्योतिषी, व्यन्तर और भवनवासी देवों की देवियाँ रहती हैं। उसके आगे पुन: वीथि आ जाती है। उसके आगे के तीन कोठों में क्रमश: व्यन्तर, ज्योतिष और भवनवासी देव रहते हैं। इसके बाद तीसरी वीथि होती है। उसके आगे के तीन कोठों में क्रमश: कल्पवासी देव, चक्रवर्ती आदिक मनुष्य एवं सिंहादिक पशु-पक्षी जन्म-जात वैर को छोड़कर उपशान्त भाव से बैठकर भगवान् के उपदेशामृत का लाभ लेते हैं। इन कोठों में मिथ्यादृष्टि, अभव्य और असंज्ञी जीव कदापि नहीं होते।
उसके आगे स्फटिक मणिमय पाँचवीं वेदी आती है। इस वेदी के आगे एक के ऊपर एक क्रमश: तीन पीठ होते हैं। प्रथम पीठ पर बारह कोठों और चार वीथियों के सम्मुख सोलह-सोलह सीढ़ियाँ होती हैं। इस पीठ पर चारों दिशाओं में अपने मस्तक पर धर्मचक्र धारण किये चार यक्षेन्द्र खड़े रहते हैं। इसी पीठ के ऊपर द्वितीय पीठ होता है। इस पीठ पर सिंह, बैल आदि चिह्नों वाली ध्वजाओं की पंक्ति, अष्ट मंगल द्रव्य, नव निधि एवं धूपघट आदि शोभायमान रहते हैं। द्वितीय पीठ के ऊपर तीसरी पीठ होती है। तीसरी पीठ के ऊपर अनेक ध्वजाओं से युक्त गन्धकुटी होती है। गन्धकुटी के मध्य में पादपीठ सहित सिंहासन होता है। भगवान सिंहासन से चार अंगुल ऊपर अष्ट महाप्रातिहार्यों से युक्त आकाश में विराजमान रहते हैं।
समवसरण का माहात्म्य- तीर्थङ्कर के समवसरण में अधोलोकवासी