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202...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता
आधुनिक वैज्ञानिकों की मान्यतानुसार एक बार के सम्भोग में दस करोड़ वीर्याणु छूटते हैं और वे कुछ समय के बाद नष्ट हो जाते हैं। वैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि आधुनिक जनसंख्या की दृष्टि से साढ़े तीन अरब से अधिक मानव विश्व में हैं। एक व्यक्ति के पास इतने वीर्य के जीवाणु हैं कि वे यदि जीवित रहें तो उनसे साढ़े तीन अरब बच्चे उत्पन्न हो सकते हैं जबकि एक साधारण मनुष्य चार-आठ या दस बच्चों से अधिक उत्पन्न नहीं कर पाता है।100 इससे स्पष्ट है कि अब्रह्म सेवन के द्वारा बहुत बड़ी हिंसा होती है जबकि ब्रह्मचर्य से अहिंसा की रक्षा होती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह बात अहिंसा के उन अनुयायियों के लिए उपहासास्पद है जो वासना को नियन्त्रित न कर कृत्रिम साधनों के द्वारा सन्तति का नियमन कर रहे हैं। __ आचार्य पूज्यपाद के अनुसार ब्रह्म सेवन से अहिंसा, सत्य, अचौर्य आदि गणों का भी संरक्षण होता है। नीतिशास्त्र की दृष्टि से 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' जीवन के तीन आदर्श हैं। हमारे जीवन में केवल सत्यता ही न हो उसमें सुन्दरत्व एवं शिवत्व भी होना चाहिए। ब्रह्मचर्य की साधना से शिवत्व आता है, सुन्दरता खिलती है।
- एक उल्लेखनीय प्रश्न यह है कि तीर्थङ्कर अजितनाथ से लेकर तीर्थङ्कर पार्श्वनाथ तक श्रमणों के चार महाव्रत थे, उनकी व्रत-व्यवस्था में ब्रह्मचर्य स्वतन्त्र महाव्रत के रूप में नहीं था, जबकि तीर्थङ्कर ऋषभदेव और तीर्थङ्कर महावीर के साधुओं के लिए पंचमहाव्रत का विधान किया गया है। तो महाव्रतों की संख्या के सम्बन्ध में इस प्रकार की भिन्नता का क्या कारण है ? क्या बाईस तीर्थङ्करों के साधुओं के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक नहीं था? इसका समाधान यह है कि उक्त दोनों प्रकार की परम्पराएँ श्रमणों की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए निर्मित हुई हैं। बाईस तीर्थङ्करों के श्रमण ऋजु प्राज्ञ थे, उनके लिए धर्म समझना अत्यन्त सरल था, इसलिए परिग्रह के अन्तर्गत स्त्री को भी परिग्रह मानकर उसमें ब्रह्मव्रत का अन्तर्भाव कर दिया गया। एतदर्थ चातुर्याम धर्म की प्ररूपणा की गयी जबकि प्रथम तीर्थङ्कर के श्रमण ऋजु जड़
और चरम तीर्थङ्कर महावीर के श्रमण वक्र जड़ होने से उनके लिए यथार्थ को समझना मुश्किल होता है अथवा देरी से समझते हैं, कदाग्रही होते हैं, कुतर्क करते हैं। अत: स्त्री परिग्रह को स्वतन्त्र महाव्रत के रूप में स्वीकारना पड़ा।