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उपस्थापना (पंचमहाव्रत आरोपण) विधि का रहस्यमयी अन्वेषण... 167 उपसंपदार्थ अयोग्य माना गया है
1. पण्डक अर्थात हिंजड़ा, 2. अदत्त कषाय वस्त्रधारी, 3. अन्य योनिधारी प्राणी, 4. मातृहन्ता, पितृहन्ता एवं अर्हतहन्ता, 5. स्त्री - पुरुष उभयलिंगी, 6. पात्ररहित, 7. चीवररहित, 8. पात्र और चीवर दोनों से रहित, 9. अन्य से याचित पात्रधारी, 10. अन्य से याचित चीवरधारी, 11. निष्प्रयोजन पात्र और चीवरधारी ।
अयोग्य की उपस्थापना करने से लगने वाले दोष
आचार्य हरिभद्रसूरि कहते हैं जिसने उपस्थापना के लिए निर्धारित दीक्षा पर्याय प्राप्त न किया हो, जिसको पृथ्वीकायादि छह काय जीवों या महाव्रतों का तथा उनके अतिचार आदि का ज्ञान न दिया गया हो अथवा देने पर भी वह उस अर्थ को भली-भाँति आत्मसात न कर पाया हो अथवा समझने पर भी जिसकी परीक्षा न की गयी हो, ऐसे अयोग्य शिष्य की पापभीरु गुरु को उपस्थापना नहीं करनी चाहिए। यदि अयोग्य को उपस्थापित किया जाता है, तो आज्ञाभंग, व्रतादि की विराधना और मिथ्यात्वादि पापों की वृद्धि आदि दोष लगते हैं | 21 स्पष्टार्थ है कि अयोग्य शिष्य की उपस्थापना करने पर जिनाज्ञा का भंग होता है, भविष्य के लिए वह परम्परा चलती रहती है, इससे मिथ्यात्व भावों की वृद्धि होती है, परिणामतः व्रत-संयम की विराधना होती है और आत्मगुणों की भी हानि होती है। अतः योग्य शिष्य को ही उपस्थापित करना चाहिए।
उपस्थापना चारित्र कब दिया जाए?
नूतन दीक्षित की उपस्थापना कब की जानी चाहिए ? इस सम्बन्ध में तीन प्रकार की कालावधि का निर्देश मिलता है। इन्हें तीन तरह की शैक्षभूमियाँ कहा गया है। सामान्यतः सामायिक चारित्र ग्रहण करने वाले नवदीक्षित साधु को शैक्ष कहते हैं और उसके अभ्यास काल को शैक्ष भूमि कहते हैं। दीक्षा ग्रहण करते समय सामायिक चारित्र अंगीकार किया जाता है । उसमें निपुणता प्राप्त कर लेने पर छेदोपस्थापनीय चारित्र स्वीकार किया जाता है जिसमें पांच महाव्रतों और छठे रात्रिभोजन विरमणव्रत को धारण करते हैं। सामायिक चारित्र और छेदोपस्थापनीय चारित्र के बीच की अवस्था शैक्षभूमि कहलाती है। इसका सम्बन्ध सामायिक चारित्र की कालमर्यादा से भी है, क्योंकि छह मास की उत्कृष्ट शैक्षभूमि के पश्चात निश्चित रूप से छेदोपस्थापनीय चारित्र स्वीकार करना