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केशलोच विधि की आगमिक अवधारणा... 143 शल्यक्रिया आदि करवाने पर साधु दोष का भागी बनता है।
केश सुन्दरता के प्रतीक हैं, अतः इनके कारण मुनियों के शीलव्रत खण्डित होने की सम्भावना भी रहती है तथा उन्हें संवारने के लिए साधनों की भी आवश्यकता रहती है। लोच करवाने से साधु इन सब चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है। ___ यदि लोच क्रिया की उपादेयता के विषय में सामाजिक अनुशीलन किया जाए तो साधु के स्वावलम्बी जीवन का एहसास होता है। मुनि धर्म के प्रति आस्था का उदय होता है। साधु को मुण्डन आदि के लिए नापित पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। इन नियमों से परिचित होने पर सामान्य गृहस्थ में भी कष्ट सहिष्णुता का अभ्यास होता है। बालों को उखाड़ने से मस्तिष्क तन्त्र प्रभावित होता है तथा स्नायु तन्त्र एवं रक्त प्रवाह सन्तुलित बनता है। इसके द्वारा ब्रह्मचर्य पालन में दृढ़ता आती है।
यदि लोच के विषय में प्रबन्धन की दृष्टि से चिन्तन किया जाए तो यह क्रिया कषाय प्रबन्धन, वासना प्रबन्धन एवं इन्द्रिय प्रबन्धन में मुख्य सहायक हो सकती है। लोच-क्रिया करने एवं करवाने में साहस की आवश्यकता होती है। उस समय हो रहे कष्ट को सहने से क्रोध आदि कषाय को उपशान्त करने में भी सहायता प्राप्त होती है। लोच करवाने हेतु व्यक्ति को अपना मस्तक झुकाना पड़ता है जिससे मान गलता है तथा पारस्परिक स्नेह भाव में भी वृद्धि होती है। इससे क्रोधादि कषाय नियन्त्रित होते हैं जिसके फलस्वरूप कषाय प्रबन्धन में सहायता मिलती है। इन्द्रियों पर नियन्त्रण सधता है। लोच करते समय मन, वचन और काया तीनों की एकाग्रता आवश्यक है। इसी के साथ लम्बी अवधि तक एक स्थान पर बैठने से कायक्लेश तप का लाभ मिलता है। इन्द्रिय चेष्टाओं में भी न्यूनता आती है। इससे इन्द्रिय-प्रबन्धन में सहयोग मिलता है। काम वासनाओं पर विजय पाने का भी यह उत्तम उपाय है। लोच से अप्रमत्तता में विकास होता है और कामोत्तेजक ग्रन्थियाँ शान्त होती हैं फलत: कामवासना स्वतः नियन्त्रित होती है। साधु की अन्य क्रियाएँ भिक्षाटन आदि भी विषय नियन्त्रण में सहयोगी होती हैं, अत: केशलोच के द्वारा वासना प्रबन्धन (Sensuary pleasure management) भी होता है।
यदि आधुनिक समस्याओं के सन्दर्भ में लोच विधि का महत्त्व आंका जाए