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62...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता नव्य युग के..... ___ 11. दास - जो दासी के गर्भ से उत्पन्न हुआ हो, क्रीत हो एवं कर्जदार हो।
दोष - दास पत्र को दीक्षा देने से उसका मालिक उसे पन: घर ले जा सकता है। यदि ऋण चुका दिया गया हो तो दीक्षित कर सकते हैं, यह आपवादिक नियम है।
12. दुष्ट - जो दुष्ट स्वभाव वाला हो। दुष्ट दो प्रकार के कहे गये हैं - 1. कषायदुष्ट - उत्कृष्ट कषाय वाला और 2. विषयदुष्ट - परस्त्री आदि में अत्यन्त आसक्त।
दोष - दुष्ट व्यक्ति के अध्यवसाय अत्यन्त संक्लिष्ट होने के कारण वह विशुद्ध रूप से चारित्र का पालन नहीं कर सकता।
13. मूढ़ - जो मोहवश या अज्ञानवश वस्तु के यथार्थज्ञान से शून्य हो।
दोष - मूढ़ आत्मा उपयोग शून्य होने से चारित्र की सम्यक् आराधना नहीं कर सकता है अत: अयोग्य कहा गया है। ___14. जुंगित - जाति आदि से हीन व्यक्ति। मुंगित के चार प्रकार बताये गए हैं -
1. जातिजुंगित - अस्पृश्य जाति में उत्पन्न व्यक्ति; जैसे - जुलाहा, पाण (गाँव के बाहर खुले आकाश में रहने वाले), डोब (गायक), वरूद्र (चटाई बनाने वाले) आदि जुगुप्सित जातियाँ। ____ 2. कर्मजुंगित - निन्दित कर्म करने वाले; जैसे - स्त्री, मोर, मुर्गा, तोता आदि को पालने वाले, नाई, धोबी, जादूगर, नट लंख (बांस पर चढ़कर खेल दिखाने वाले), शिकारी, कसाई, मच्छीमार आदि।
3. शिल्पजुंगित - चर्मकार, नापित, रजक, कौशेयक (रेशमी वस्त्र बनाने वाला) आदि।
4. शरीरजुंगित - हाथ, पैर, कान, नाक, होठ से रहित, वामन, कुब्ज, पंगु, हाथ से विकल, एकाक्ष (काना) आदि शरीर से अपंग व्यक्ति दीक्षा के अयोग्य हैं।
दोष - जुंगित व्यक्तियों को दीक्षा देने से लोकनिन्दा होती है।
15. अवबद्धक - जो व्यक्ति धन या विद्या के निमित्त किसी के द्वारा बंधा हुआ हो, वह दीक्षा के लिए अयोग्य होता है।