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46...जैन मुनि के व्रतारोपण की त्रैकालिक उपयोगिता 7. नंदति जेण तवसं जमेसु, नेव य दरत्ति खिज्जंति। जायंति न दीणा वा, नंदि अ ततो समय सन्ना।।
अभिधानराजेन्द्रकोश, भा. 4, पृ. 1753 8. बृहत्कल्पभाष्य, संपा. पुण्यविजयजी, 1177-81 9. आवश्यकनियुक्ति (नियुक्तिसंग्रह), 549 10. वही, गा. 553 11. वही, गा. 556, 558, 560, 563 12. (क) तिलोयपण्णत्ति, 4/710-895
(ख) हरिवंशपुराण, 7/1-161
(ग) महापुराण, 22/77-312 13. बृहत्कल्पभाष्य-1 की वृत्ति 14. प्रवचनसारोद्धार, गा. 441-450 पर आधारित 15. बृहत्कल्पभाष्य, गा. 1182 16. आवश्यकनियुक्ति (नियुक्तिसंग्रह), गा. 566 17. वही, गा. 565 18. पंचाशकप्रकरण, 2/12-13 19. विधिमार्गप्रपा - सानुवाद, पृ. 85-95 20. वही, पृ. 30 21. दीक्षाविधि, संकलित, पृ. 7