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________________ आगमेणं, सुएणं, जहा जहा धारणा जीता-ता ववहारं पट्ठवेज्जा । सुए आणाए, धारणाए, से आगमे जीएणं । आणा महु भंते! आगमबलिया समणा निग्गंथा ? इच्चेतं पंचविहं ववहारं जदा जदा जहिं जहिं 'तदा तदा तहिं तहिं अणिस्सि ओस्सितं सम्मं ववहरमाणे समणे निग्गंथे आणाए आराहए भवइ ॥ ( — भगवई — सतं ८ । ३०१, ववहारं उ० १०, ठाणं ५ | १२४) इहां पांच ववहार में धारणा ववहार अनै जीत ववहार पिण कह्यो । सुध सरधा आचारवंत साधु नो बांध्यो जीत ववहार में दोष नहीं। ने जीत ववहार ना केतला एक बोल कहै छै दूहा १२ जीत ववहार ना बोल नो, आखूं छू अधिकार । दृढ़ समदृष्टि निपुण ते, नाणे संक लिगार ॥ १३ नित्य पिंड सुखे न बहिरणो, दूजी वार बलि देख | उण घर जाये गोचरी, तिण में इतो विशेष ॥ १४ जीत ववहार बड़ा तणों, सांभळजो भिक्षु स्वाम तणीं भली, मर्यादा सुखकार ॥ नर नार । १. लय : एतो जिन मारग रा । २. पात्र । ३. छाछ को गर्म करने के बाद उसके ऊपर नितर कर आया हुआ पानी । ३३४ तेरापंथ : मर्यादा और व्यवस्था जोय । छै ए तो स्वाम बड़ा सुखकारी रे, भिक्षु नी बुद्धि भारी बांधी दृढ मर्याद उदारी रे, सूत्र न्याय अनुसारी ॥ ध्रुपदं ॥ १५ ठाम मांहि मावे नहीं रे, धोवण पाणी पाछो जाय नें ल्यावणो, दोष नहीं १६ जे किवाड मांहि हुवै तो, पाछो जाय आछ ३ छाछ रे वासते, दूजी बार पिण १७ माथादिक ने कारणे रे, पाछे कध नें पाणी । बचियो हुवै धोवतां ते, पाछे ल्यावै जाणी ॥ कोय ॥ ल्यावे । जावै ॥
SR No.006153
Book TitleTerapanth Maryada Aur Vyavastha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya, Madhukarmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2004
Total Pages498
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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