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________________ १ २ ३ ४ ५ ६ ढाळ २५ चरण रयण चिन्तामणि, भाग्य प्रमाणे पायो, कांई भिक्षु स्वाम प्रसादे हो लाल । कडो ही काम वणै कदा, तो गण में थिर पग रोपै, पिण चारित्र नहीं विराधै हो लाल ॥ सासण रंग रत्ता सदा, परम प्रीत गणपति स्यूं, अनुकलपणे प्रवर्त्ती । सुनीता सिर सेहरा, तसु च्यार तीर्थ गुण गावै, छै जसु चिहुं दिश कीर्ति ॥ निन्दक टाळोकर भणी, मन कर नैं नहीं बंछै, कांई जाणे 'भूर भुयंगा | जब आसता गणी तणी, शंक कंख नहीं ल्यावै, रहै सदा मत करो गणी असातना, मति खीजावो काष्ठ व ज्यूं प्रवाह में, पापी नै दुरगति में, पाप ले जावै कोइ, ए जिनवर नीं आवैं, . ढाळे ढळतो इकरंगा ॥ १. लय — पातक छाने नवि रहै आपण मैं । २. भयंकर सर्प । ११८ तेरापंथ : मर्यादा और व्यवस्था वाणी । पातक छानो नवि रहै, आपण चोड़े संत असातना एहवी, निश्चय सही कर जाणो, दुरगति नीं नीसाणी ॥ भगवती अंगे भाखियो, श्रीमुख अंतरजामी, कुशिष्यक शतक निहाळी । असातना दुखदायनी, सीख सुवनीत सुभागी, असातना दै टाळी ॥ ताणी । पाणी । ३. भगवई सतं १५ ।
SR No.006153
Book TitleTerapanth Maryada Aur Vyavastha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya, Madhukarmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2004
Total Pages498
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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