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________________ ૩૯૧ ચોથા ગણના ભવિષ્યકર્મણિકંદન ચોથા ગણના ભવિષ્યકર્મણિકૃદન્ત कुप् - कोपिष्यमाण क्षम् - क्षमिष्यमाण | दृप् - दर्पिष्यमाण क्रुध् - क्रोत्स्यमान रुष - रोषिष्यमाण दय॑मान पुष् - पोक्ष्यमाण लुप् - लोपिष्यमाण द्रप्स्यमान नृत् - नर्तिष्यमाण विद् - वेत्स्यमान वि+पद्- विपत्स्यमान नश् - नशिष्यमाण दीप् - दीपिष्यमाण पूरिष्यमाण नक्ष्यमाण युज - योक्ष्यमाण भ्रम् - . भ्रमिष्यमाण तोक्ष्यमाण अस् - असिष्यमाण भ्रंश् - भ्रंशिष्यमाण मोहिष्यमाण इष् - एषिष्यमाण यस् - यसिष्यमाण मोक्ष्यमाण ई - एष्यमाण ली- लेष्यमाण - लोभिष्यमाण आयिष्यमाण लायिष्यमाण लुट - लोटिष्यमाण क्लम् - क्लमिष्यमाण रञ् - रक्ष्यमाण क्षुभ् - क्षोभिष्यमाण छो - छास्यमान व्यध् - व्यत्स्यमान मद् - मदिष्यमाण छायिष्यमाण श्लिष् - श्लेक्ष्यमाण श्रम् - श्रमिष्यमाण जरिष्यमाण शो - शास्यमान शम् - शमिष्यमाण जारिष्यमाण शायिष्यमाण जन् - जनिष्यमाण तम् - तमिष्यमाण |ष्ठिव् - ष्ठेविष्यमाण युध् - योत्स्यमान त्रस् - त्रसिष्यमाण | सिव् - सेविष्यमाण सिध् - सेत्स्यमान दम् - दमिष्यमाण साविष्यमाण ऋध् - अर्धिष्यमाण | दिव् - देविष्यमाण सो - सास्यमान द्रुह् - ध्रोक्ष्यमाण |दो - दास्यमान सायिष्यमाण शुष् - शोक्ष्यमाण दायिष्यमाण नत्स्यमान तृप् - त्रप्स्यमान दविष्यमाण दुष् - दोक्ष्यमाण तर्व्यमान दाविष्यमाण ऋध - अर्धिष्यमाण तर्पिष्यमाण स्निह् - स्नेहिष्यमाण मन् - मंस्यमान स्नेक्ष्यमाण नह - नस्त
SR No.006058
Book TitleHaim Sanskrit Dhatu Rupavali Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDineshchandra Kantilal Mehta
PublisherRamsurishwarji Jain Sanskrit Pathshala
Publication Year2006
Total Pages298
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size15 MB
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