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बारमी, जिनहर्ष कहे तुं जोय ॥१॥रास ॥
॥दोहा॥ ॥ वयण सुणी ते शेग्नां, कुमरी कीध विचार।। ए पापी मुजनांजशे, शीलरयण शणगार ॥१॥ कूड कपट कर राखवू, शील अमूलक एह ॥ चिंतवे एम मदालसा, वयण कहे सुसनेह ॥२॥ सुणो शेठ साहिब तुमें, वयण का सुप्रमाण ॥ मरण थयुं प्री तम त', दशदिन तेहनी काण ॥३॥ तुमने गमशे तेम होशे, चडी तुमारे हाथ ॥ परमेशर मेख्यो हवे, ताहरो माहारो साथ ॥४॥ नतावला सो बावरा, धीरे सब कबु होय ॥माली सिंचे सो घडा, रुतु आवे फल होय ॥५॥ किणहीक नगरें जाइये, मास दिव सने ह ॥ पुरपतिनीलेश आगना, आवीश ताहरे गेह ॥६॥ नाम म लेश माहरूं, हुं बु ताहरी नार ॥ शेउनणी कीधो खुशी, कुमरी बुद्धि विचार ॥७॥ ॥ढाल तेरमी॥ कपर होये अति जलोरे॥ए देशी।।
॥ वृक्ष कहे कुमरीनणी रे, करिये शील जतन्न। त्रिन्नुवनमांहे दोहेलुं रे, लहेतां एह रतन रे ॥१॥ बहे नी, सानल माहारी वात ॥ झीलें अरि करी केशरी रे, न करे को घात रे ।। व० ।। ए प्रांकगी। वायु
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