SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 33
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २० आनंदघनजी कृत पद. दोरी शील लंगोटी, घुल घुल गांव घुलाचं ॥ तत्त्व गु फामें दीपक जोनं, चेतन रतन जगाचं रे वहाला॥ता ॥१॥ अष्ट करम कंमैकी धूनी, ध्याना अगन जला नं ॥ उपशम बनने जसम बणावं, मली मली अंग लगांचं रे वहाला ॥ ता० ॥ २ ॥ आदि गुरुका चेला हो कर, मोहके कान फरावं ॥ धरम शुकल दोड मुश सोहे, करुणा नाद बजाउं रे वहाला.॥ तास ॥ ३ ॥ इह विध योग सिंहासन बैग, मुगति पुरीकू ध्यानं ॥ आनंदघन देवेंसें जोगी, बदुर न कलिमें आ रे वहाला ॥ ता० ॥ ४ ॥ ॥पद आडत्रीशमुं ॥ राग मारु ॥ ॥मनसा नटनागरसूं जोरी हो।म॥ नटनागरसूं जोरी सखी हम, और सबनसों तोरी हो ।म॥१॥लो क लाजतूं नांहीं न काज, कुल मरयादा बोरी हो। लोक बटान हसो बिरानो, अपनो कहत न कोरी हो ॥ म० ॥ ॥ मात तात अरु सजान जाति, वात क रत है जोरी हो॥चाखे रसकी क्युं करि लूटे, सुरिजन सुरिजन टोरी हो ॥ ३ ॥ औरहनो कहा कहावत और, नांहि न कीनी चोरी हो॥कान कल्यो सो ना चत निवहे, और चाचर चर फोरी हो ॥म० ॥४॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.005372
Book TitleAnandghanji tatha Chidanandji Virachit Bahotterio
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages114
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy