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( ३७ )
यप ॥ २१ ॥ शी परें थाये श्रिर संसार, केम पाने वहेलो जवपार ॥ शे संसार सोहेलो तरी, पुण्यवंत पामे शिवपुरी || २२ ॥
॥ दोहा ॥
॥ जीव सवे जगती तथा, तुं तस बंधु समान ॥ जाव मनोगत सवी लहें, होय अनंतुं ज्ञान ॥ २३ ॥ पुवी पदारथ जे थाने, ते देखे मुनि देव ॥ कृपा क री जगवन् कहो, कर्म फलाफल देव ॥ २४ ॥ गुण गि. रुन गणधर जलो, हर्षे जोडी हाथ ॥ सफल करो मुज विनति, जतिय जी जगनाथ ॥ २५ ॥ गोयम गणहर विनव्यो, एणी परें वीरजिणंद ॥ नमे निरंतर पय कमल, जेहना चोराव इंद ॥ २६ ॥ वीतराग वलतुं वदे, वाणी सरस अपार || सुण गोयम गणधार तुं, पूठ्या तणो विचार ॥ २८ ॥
॥ चोपाइ ॥
॥ गोयम पृष्ठा पूठी रहे, वलतुं वीर जिनेसर क दे ॥ सावधान सवि परषद दुइ, निसुणे निज जापा जूजू ॥ २७ ॥ वरसे स्वामि वचन विलास, पोहोचे जवियण जन मन वाश || आषाढो सासाढो मेह. करी गाजीनें श्राव्यो एड् ॥ २९ ॥ तेषे अवसर नावी
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