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(३२) ॥ मी० ॥ लोग संयोग सौजाग्य ॥ हां ।। श्रायु घणुं ते वरे रे ॥ श्रायु ॥५॥ केणे पुण्ये बदु बुद्धि ॥हा॥ चतुरता अति घणी रे ॥ च ॥ नणे गणे सिद्धांत ॥ हां ॥ जणावे सहु जणी रे॥ ज० ॥ देव गुरुना गुण गाय ॥ हां ॥ नक्ति गुरुनी करे रे ॥ ज०॥ तेणे पुण्ये करी तेह ॥ हो ॥ पंमित होय शिरे रे ॥ पं०॥६॥ लखमी रहे स्थिरवास ॥ हांग ॥ कोडी विणसे नही रे ॥ को० ॥..परनव तेणे पुण्य ॥ हां ॥ कस्यां कोण नम्मही रे'॥ का ॥ देई दान शुज पात्र ।। हां परतावी नवि धरे रे ॥ ५० ॥ तस घर शकि समृद्धि ॥ हां०॥ सदा वासो करे रे ॥ स० ॥७॥ पौढा पुत्र प्रधान ।। हां० ॥ होय जेहने घरे रे ॥ के हो॥ नारी होय सुपात्र ॥ हां०॥ केणे पुण्ये अनुसरे रे॥ के ॥जीवदया मन शुरु ॥ हांग ॥ पाले नही कारिमी रे ॥पा०॥ वीर कल्याणनी कोडि ॥ हां ॥ रोहे ढाल बारमी रे॥ ल॥७॥
॥दोहा॥ ॥ केणे लक्षणे क्षत्री होये, केणे लक्षणे द्विज जा त। वैश्य केणे लक्षणे होय, केम होये शूज जात ॥ २॥ संग्रामें शूरों होय, पागे पग नवि देय ॥ शरणे
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