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१०२.
ज्ञान विलास
ध्यान धारणवासी ॥ प्राणायाम समाधि सुरंगी, भूलोत्तर सुविलासी ॥ मे० ॥ २ ॥ रेचकपूरक कुंजक दें, बादर मन वशकारी ॥ चरम रंध्र मध्यगेहें पूरी, अनहद नाद विचारी ॥ मे० ॥ ३ ॥ बादर योग युगति सह थिरता, श्रातम ध्यान विलासी ॥ पांचवरण पण तत्व सुदर्शी, परमातम गत जासी ॥ मे० ॥ ४ ॥ परमातम अनुसारे करतां, निज सहु जाव विकासी ॥ चारित ज्ञानानंद सन्यासी, जाने तिण निजवासी ॥ मे० ॥ ५ । इति ॥
॥ पद ब्वीशमुं ॥
॥ राग आशावरी फाग ॥ कैसें विचार करो जाइ साधु, दिव्य विचारें मन श्राराधो ॥ कै० ॥ टेक ॥ जो परथम सिद्धगति अनुवियें, संसृति विष कहां सिद्ध होय साधो ॥ कै० ॥ १ ॥ संसृति चउगति जेद कहावे, तीन जेद तीग वेद सुजानो ॥ नारक तिरि जो परथम कहियो, निरजर नर बिनतें कैसे मानो ॥ कै० ॥ २ ॥ चउगति परथम जेद बखानुं, नरनारी कुप पहिले जायो ॥ बीज जाड पहिले कु ण कहियें, इग विना ग किहांसें श्राय ॥ कै० ॥ ३ ॥
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