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________________ २२४ चतुर्थस्तुतिनिर्णय भाग-१ तिसमें जेकर कोइ मुग्ध जीव ऐसा कहे के श्रीवज्रस्वामीजीने तो एकही वार कायोत्सर्ग कराथा, परंतु प्रतिदिन कायोत्सर्ग नही कराथा. तिसका उत्तर लिखते है के श्रीवज्रस्वामीजीतो अतिशय युक्त थे तिस वास्ते उनकू तो एकही वार कायोत्सर्ग करनेसे क्षेत्रदेवता प्रगट होके आज्ञा दे गइथी, और अबतो नित्य करते है तोभी क्षेत्रदेवता प्रत्यक्ष नही होती है इस वास्ते श्रीवज्रस्वामीजीकी बराबरी करके जो प्रतिदिन कायोत्सर्ग करनेका निषेध करें तिसकों सब मूल्मे शिरोमणि जानना, और प्रतिदिन क्षेत्रदेवतादिकका जो कायोत्सर्ग करते है, सो बात जीवानुशासन ग्रंथकी साक्षीसें करते है तिस्का पाठ हम उपर लिख आए है. तथा दूसरा फेर आवश्यक सूत्रकाभी पाठ लिख कर दिखाते है, सो पाठ यह है॥ (७५) यदुक्तं ॥ मममं- गलमरिहंता, सिद्धा साहु सुहं च धम्मो अ ॥ सम्मट्टिी देवा, दितु समाहिं च बोहिं च ॥४७॥ मम इत्यात्मनिर्देशे मंगलं दव्वमंगलं भावमंगलं च दव्वमंगलं दहियक्खयाइणो, भावमंगलं एगतियमच्चंतियं सारी राइपच्चूहोवसामगत्तेण मांगलयति भावात् मंगं वा लातीत्यादिशब्दार्थत्वप्रवृत्तेश्च इदमेवाहदादिविषयं पंचविधं ॥ तदेवाह ॥ अरिहंता सिद्धा साहूसुयं च धम्मो य तत्थ ॥ अट्ठविहं पि य कम्मं, अरिभूयं होइ सव्वजीवाणं ॥ तं कम्ममरिहंता, अरिहंता तेण वुच्चंति ॥ तथा षिञ् बंधने सितं बद्धं ध्मातं दग्धं कर्म यैस्ते सिद्धाः ॥ तथा ज्ञानादिभिर्निर्वाणं साधयंतीति साधवः ॥ श्रूयति इति श्रुतम् ॥ अंगोपांगादिविविधभेद आगमः ॥ दुर्गतिपतज्जंतुधारणाद्धर्मः ॥ चशब्दः समुच्चयार्थः । इह चान्यत्र चत्वार्येव मंगलानि पठयंते ॥ इह तु अनुष्ठानरूपधर्मस्य प्रकान्तत्वाद्धर्मस्यापि पंचमंगलतया विषेषभणनमदोपायेति तथा सम्यविपरीता दृष्टिस्तत्त्वार्थदर्शनं येषां ते सम्यग्दृष्टयो देवा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004920
Book TitleChaturtha Stuti Nirnaya Part 1 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj
PublisherNareshbhai Navsariwala Mumbai
Publication Year2007
Total Pages386
LanguageGujarati, Hindi
ClassificationBook_Gujarati
File Size14 MB
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