SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 110
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १०५ पति बाबत कांई निश्चय जाणवामां आव्यो नथी, कांई नक्का जणाय पछी पण मरवानो अभिलाष तो करी शकाय एम छे. पछी रत्नावलीए ए धात्रीनुं एवं निषेधक वचन सांभळीने मौन राख्यु. क्षणांतरे धात्रीनी नजर चुकावीने अने पोतानो परिवार न जाणे ए रीते रत्नावली रहेबाना स्थानमाथी बहार नीकळी गई अने दूरना भागमां आवेला वनना निकुंजमां पेठी पछी पोताना बन्ने हाथना संपुटने जोडीने कहेवा लागी-हे वननी देवीओ ! हुं मंदपुण्य-कमनसीब-छु, मारं वचन सांभळो. तमारा सिवाय अहीं बीजं कोण छे जेनी पासे मारं कार्य-मारी पोतानी वात-कहीं शकुं ? १ __विरूप-नठारां लक्षणोना समूह द्वारा आ हुँ दुःख माटे ज निर्मित थयेल छु, परण्या पछी पण जेणीने-मने--आवं पतिना विरहनु दुःख शरू थइ गयेल छे. २. माटे ज हमणां तमारी सामे उंचा वृक्ष उपर लटकीने-मारी जातने लटकावीने अर्थात् गळे फांसो खाईने मरूं छु. अपजशना मेलथी मेला थयेला एवा आ जीवनने टकावीने शुं करवू ? ३ ___ हे सिरिपुरराजाना पुत्र ! तुं पण दूर रहेलो छे छतां जाणी लेजे के ते रांक बाईए तारा विरहने लीधे आत्माने छोडी दीधेल छे-गळे फांसो खाधेल छे. ४ पृ०६४]आम कहीने ते रत्नावलीए केशपाशने बांधी दीधा,पोताना कपडानी गांठ खुब कठग बांधी अने उत्तरीय वस्त्रवडे-पोताना ओढवाना कपडा वडे-वृक्षनी डाळ उपर फांसो बनाव्यो, फांसाने पोतानी डोकमां बराबर बांध्यो अने पोते लटकी पडी. बराबर आ वखते धात्रीए Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004873
Book TitleMahavira Charit
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBechardas Doshi
PublisherPrakrit Vidya Mandal Ahmedabad
Publication Year1966
Total Pages154
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati, History, & Story
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy