________________ (1) जानकर हलका वस्त्र नहीं लेंगे. किन्तु नौका विहारिणी के सुन्दर और आकर्षक चित्र को लेने की तो आप भी इच्छा करेंगे। आज प्रचार के विचार से वनों पर भद्दे और अश्लील चित्र भी आने लगे हैं और मैंने ऐसे कई मन चले मनुष्यों को देखे है जो मोहक चित्र के कारण ही एक दो आने अधिक देकर वस्त्र खरीद लेते थे। इस प्रकार संसार में किसी भी समय कामराग की अपेक्षा वैराग्य अधिक संख्या के संख्यक मनुष्यों में नहीं रहा भूतकाल के किसी भी युग में ( काल ) ऐसा समय नहीं आया किजब मोहराग से विराग अधिक प्राणियों में रहा हो। __तीर्थंकर मूर्ति यदि नियमित रूप से सभी के हृदय में वैराग्योत्पादक ही हो तो-आये दिन समाचार पत्रों में ऐसे समाचार प्रकाशित नहीं होते कि-"अमुक ग्राम में अमुक मन्दिर की मूर्ति के आभूषण चोरी में चले गये, धातु की मूर्ति ही चोर ले उड़े अमुक जगह मूर्ति खण्डित करडाली गई, आदि इन पर से सिद्ध हुआ कि वीतराग की मूर्ति से वैराग्य होना नियमित नहीं है। वैराग्य भाव तो दूर रहा पर उल्टा यह भी पाया जाता है कि चोरी और द्वेष जैसे दुष्ट भाव की भी मूर्ति उत्पादिका बन जाती है, क्योंकि उसके बहमूल्य आभूषण या स्वयं धातु मूर्ति आदि ही चोर को चोरी करने को प्रेरणा करते हैं, बहुमूल्यत्व के लोभ को पैदा कर मूर्ति चोरी करवाती है, और द्वेषी आततायी के मनमें मूर्ति तोड़ने के भाव उत्पन्न कर देती है / इससे तो मूर्ति निन्दनीय भावोत्पादिका भी ठहरी। .. अतएव सरल बुद्धि से यही समझो कि स्त्री चित्र से रागो