________________ भवभावना (6) कोहम्मि सूरविप्पो मयम्मि आहरणमुज्झिय कुमारो। मायाइ पणियदुहिया लोभम्मि य लोभनंदोत्ति // 438 // होंति पमत्तस्स विणासगाणि पंचिंदियाणि पुरिसरस / उरगा इव उग्गविसा गहिया मंतोसहीहिं विणा // 439 // सोयपमुहाण ताण य दिटुंता पंचिमे जहासंखं / रायसुयसेट्टितणओ गंधमहुप्पिय महिंदा य // 440 // हिंसालियपमुहेहि य आसवदारेहिं कम्ममासवइ / नावव्व जलहिमझे जलनिवहं विविहड्डेिहिं // 441 // ललियंग-धणायर-वज्जसार वणिओत्त-सुंदरप्पमुहा / दिटुंता एत्थंपि हु कमेण विबुहेहिं नायव्वा // 442 // जो सम्मं भूयाइं पेच्छइ भूएसु अप्पभूओ य / कम्ममलण न लिप्पइ सो संवरियासच दुवारो // 443 // हिंसाइ इंदियाइं कसायजोगा य भुवणवेरीणि / कम्मासवदाराई रंभसु जइ सिवसुहं महसि // 444 // निग्गहिएहिं कसाएहिं आसवा मूलओ निरुभंति / अहियाहारे मुक्के रोगा इव आउरजणस्स // 445 // रुंभंति तेऽवि तवपसमझाण सन्नाण चरण करणेहिं / अइबलिणोऽवि कसाया कसिणभुयंगव्व मंतेहिं // 446 // गुण कारयाई धणियं धिइरज्जु निमंतियाई तुह जीव / निययाइं इंदियाई पल्लिनिउत्ता तुरंग व्व // 447 // मणवयणकायजोगा सुनियत्ता तेऽवि गुणकरा होति / अनियत्ता उण भंजंति मत्तकरिणो व्व सीलमणं / / 448 //