________________ // 1 // // 2 // // 3 // // 4 // // 5 // श्रीधर्मदासगणिविरचिता ॥उवएसमाला // नमिऊण जिणवरिंदे, इंदनरिंदच्चिए तिलोयगुरु / उवएसमालुमिणमो, वुच्छामि गुरूवएसेणं जगचूडामणिभूओ, उसभो वीरो तिलोअसिरितिलओ। एगो लोगाइच्चो, एगो चक्खू तिहुअणस्स संवच्छरमुसभजिणो, छम्मासा वद्धमाणजिणचंदो / इअ विहरिआ निरसणी, जइज्ज एओवमाणेणं जइ ता तिलोअनाहो, विसहइ बहुइँ असरिसजणस्स / इअ जीअंतकराई, एस खमा सव्वसाहूणं न चइज्जइ चालेउं, महइमहावद्धमाणजिणचंदो। . उवसग्गसहस्सेहि वि, मेरू जह वायगुंजाहिं भद्दो विणीअविणओ, पढमगणहरो समत्तसुअनाणी / जाणतो वि तमत्थं, विम्हिअहिअओ सुणइ सव्वं जं आणवेइ राया, पगईओ तं सिरेण इच्छंति / / इअ गुरुजणमुहभणिअं, कयंजलिउडेहिं सोअव्वं जह सुरगणाण इंदो, गहगणतारागणाण जह चंदो / जह य पयाण नरिंदो, गणस्स वि गुरू तहाणंदो बालु त्ति महीपालो, न पया परिभवइ एस गुरु उवमा / जं वा पुरओ काउं, विहरंति मुणी तहा सो वि पडिरूवो तेयस्सी, जुगप्पहाणागमो महुरवक्को / गंभीरो धीमंतो, उवएसपरो अ आयरिओ अपरिस्सावी सोमो, संगहसीलो अभिग्गहमई य / अविकत्थणो अचवलो, पसंतहियओ गुरू होइ // 6 // // 7 // // 8 // // 9 // // 10 // // 11 //