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________________ औपपातिकसूत्र का परिचय ले. श्री देवेन्द्रमुनि शास्त्री (आगमप्रकाशन समिति (ब्यावर) से प्रकाशित 'औपपातिकसूत्र' की 'श्रीदेवेन्द्रमुनि शास्त्री' की प्रस्तावना से कुछ अंश यहाँ साभार प्रस्तुत हो रहा है।) औपपातिक प्रथम उपांग है। अंगों में जो स्थान आचारांग का है, वही स्थान उपांगों में औपपातिक का है। प्रस्तुत आगम के दो अध्याय हैं। प्रथम का नाम समवसरण है और दूसरे का नाम उपपात है। द्वितीय अध्याय में उपपात सम्बन्धी विविध प्रकार के प्रश्न चर्चित हैं / एतदर्थ नवांगी टीकाकार आचार्य अभयदेव ने औपपातिकवृत्ति में लिखा है-उपपात-जन्म देव और नारकियों के जन्म तथा सिद्धि-गमन के वर्णन से प्रस्तुत आगम का नाम औपपातिक है। . विन्टरनित्ज ने औपपातिक के स्थान पर उपपादिक शब्द का प्रयोग किया है। पर औपपातिक में जो अर्थ की गम्भीरता है, वह उपपादिक शब्द में नहीं है। प्रस्तुत आगम का प्रारम्भिक अंश गद्यात्मक है और अंतिम अंश पद्यात्मक हैं। मध्य भाग में गद्य और पद्य का सम्मिश्रण है। किन्तु कुल मिलाकर प्रस्तुत सूत्र का अधिकांश भाग गद्यात्मक ही है। इसमें एक ओर जहाँ राजनैतिक, सामाजिक और नागरिक तथ्यों की चर्चाए की हैं, दूसरी ओर धार्मिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक तथ्यों का भी सुन्दर प्रतिपादन हुआ है। इस आगम की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें जो विषय चर्चित किये गये हैं, वे विषय पूर्ण विस्तार के साथ चर्चित हुए हैं। यही कारण है कि भगवती आदि अंग-आगमों में प्रस्तुत सूत्र को देखने का सूचन किया गया, जो इस आगम के वर्णन की मौलिकता सिद्ध करता है। श्रमण भगवान् महावीर का आनखशिख समस्त अंगोपांगो का विशद वर्णन इसमें किया गया है, वैसा वर्णन अन्य किसी भी आगम में नहीं है। भगवान् महावीर की शरीर-सम्पत्ति को जानने के लिए यह आगम एकमात्र आधार है। इसमें भगवान् के समवसरण का सजीव चित्रण हुआ है। भगवान् महावीर की उपदेश-विधि भी इसमें सुरक्षित है। चम्पा नगरी : एक विश्लेषण चम्पा अंगदेश की राजधानी थी। अथर्वदेव में अंग का उल्लेख है। गोपथ ब्राह्मण में भी अंग और मगध का एक साथ उल्लेख हुआ है। पाणिनीय अष्टाध्यायी में भी अंग का नाम बंग, कलिंग और पुण्डू आदि के नामों के साथ उल्लिखित है। रामायण में अंग शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए एक आख्यायिका दी है। शिव की क्रोधाग्नि से बचने के लिए कामदेव इस प्रदेश में भागकर आया / अंग का परित्याग कर 1. उपपतनं उपपातो-देव-नारक-जन्म सिद्धिगमनं च / अतस्तमधिकृत्य कृतमध्ययनमौपपातिकम् / - औप. अभयदेव वृत्ति 2. अथर्ववेद-५-२२-१४. 3. गोपथ ब्राह्मण-२-९. 4. अष्टाध्यायी-४-१-१७० 5. रामायण-४७-१४
SR No.004431
Book TitleUvavai Suttam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMunichandrasuri
PublisherMahavir Jain Vidyalay
Publication Year2012
Total Pages362
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aupapatik
File Size7 MB
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