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________________ कर्ता नहीं हो सकता, क्योंकि नियुक्तियां यापनीय और श्वेताम्बर दोनों में मान्य हैं। यदि वे एक सम्प्रदाय की कृति होती तो दूसरा सम्प्रदाय उसे मान्य नहीं करता। यदि हम आर्यविष्णु को दिगम्बर पट्टावली में उल्लिखित आर्यविष्णु समझें तो इनकी निकटता अचेल परम्परा से देखी जा सकती है। दूसरे विदिशा के अभिलेख में जिस भद्रान्वय एवं आर्यकुल का उल्लेख है उसका सम्बंध इन गौतमगोत्रीय आर्यभद्र से भी माना जा सकता है, क्योंकि इनका काल भी स्पष्ट सम्प्रदाय-भेद एवं उस अभिलेख के पूर्व है। दुर्भाग्य से इनके संदर्भ में आगमिक व्याख्या-साहित्य में कहीं कोई विवरण नहीं मिलता, केवल नाम-साम्य के आधार पर हम इनके नियुक्तिकार होने की सम्भावना व्यक्त कर सकते हैं। . . इनकी विद्वत्ता एवं योग्यता के सम्बंध में भी आगमिक उल्लेखों का अभाव है, किंतु वृद्धवादी जैसे शिष्य और सिद्धसेन जैसे प्रशिष्य के गुरू विद्वान होंगे, इसमें शंका नहीं की जा सकती। साथ ही इनके प्रशिष्य सिद्धसेन का आदरपूर्वक उल्लेख दिगम्बर और यापनीय आचार्य भी करते हैं। अतः इनकी कृतियों को उत्तर भारत की अचेल परम्परा में मान्यता मिली हो, ऐसा माना जा सकता है। ये आरक्षित से पांचवी पीढ़ी में माने गए हैं। अतः इनका काल इनके सौ-डेढ़ सौ वर्ष पश्चात ही होगा अर्थात ये भी विक्रम की तीसरी सदी के उत्तरार्द्ध या चौथी के पूर्वार्द्ध में कभी हुए होंगे। लगभग यही काल माथुरीवाचना का भी है। चूंकि माथुरीवाचना यापनीयों को भी स्वीकृति रही है, इसलिए इस कालक के शिष्य गौतमगोत्रीय आर्यभद्र को नियुक्तियों का कर्ता मानने में काल एवं परम्परा की दृष्टि से कठिनाई नहीं है। ___ यापनीय और श्वेताम्बर दोनों में नियुक्तियों की मान्यता के होने के प्रश्न पर भी इससे कोई बाधा नहीं आती, क्योंकि येआर्यभद्र आर्य नक्षत्र एवं आर्यविष्णु की ही परम्परा के शिष्य हैं। सम्भव है कि दिगम्बर परम्परा में आर्यनक्षत्र और आर्यविष्णु की परम्परा में हुए जिन भद्रबाहु के दक्षिण में जाने के उल्लेख मिलते हैं, जिनसे अचेल धारा में भद्रान्वय और आर्यकुल का आर्विभाव माना जाता है, वे ये ही आर्यभद्र हों। यदि हम इन्हें नियुक्तियों का कर्ता मानते हैं, तो इससे नंदीसूत्र एवं पाक्षिक सूत्र में जो नियुक्तियों के उल्लेख हैं वे भी युक्तिसंगत बन जाते हैं। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि नियुक्तियों के कर्ता आर्य नक्षत्र की परम्परा में हुए आर्यविष्णु के प्रशिष्य एवं आर्य संपालित के गुरू-भ्राता गौतमगोत्रीय आर्यभद्र ही हैं। यद्यपि मैं अपने इस निष्कर्ष को अंतिम तो नहीं कहता, किंतु इतना अवश्य कहूंगा कि इन आर्यभद्र को नियुक्ति का कर्ता स्वीकार करने पर हम उन अनेक विप्रतिपत्तियों से बच सकते हैं, जो प्राचीन गोत्रीय पूर्वधर भद्रबाहु काश्यपगोत्रीयआर्यभद्रगुप्त और वाराहमिहिर के भ्राता [110]
SR No.004417
Book TitlePrakrit evam Sanskrit Sahitya ke Jain Aalekh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherPrachya Vidyapith Shajapur
Publication Year2015
Total Pages150
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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