________________ [25 जीवनपति ] पाम्या हता. पोताना शिष्यमा सुवर्ण अने सुगंधना | शरदी अने तावथी घेराई गयु. औषधोपचारथी आराम सुमेळनी जेम विनय अने विद्वत्तानो सुयोग जोईने | थयो. चातुर्मास बाद तेओ अनेक क्षेत्रोने लाभ आपता पू० श्रीअमी वि० म० ना मनमा आनंदनी अक भावना | आपता पाली पधार्या. अहीं पुनः ज्वरे तेमना शरीर उपर छलकी ऊठी. पोताना पछी पोतानी शिष्य संततिनी | आक्रमण कये. अनेक उपचारो करवामां आव्या छतां जीवननौकानो कर्णधार कोण बनशे मे चिंताथी तेओ | आराम न थयो. आथी तेमणे 1987 नु चातुर्मास मुक्त बन्या. आथी तेमणे शान्तिनो अक श्वास लीधो. संघना आग्रहथी पालीमा ज कयु. गुरुदेवनी अस्व स्थताना कारणे व्याख्यान गुरुनी सेवामा खडे पगे भावना अपूर्ण रही हाजर रहेनार पू० मु० श्रीक्षमावि० महाराजे संभाळी - पू० म० श्री क्षमा वि०म० मनमां विचारी लीधु पू० अमी वि० म० नी तबीयत दिन प्रतिदिन रह्या हता के-गुरुदेवश्रीनी पासे शिष्यसंपत्ति छ, वधारे लथडवा मांडी. क्षय लागु पडी गयो. आजुविद्वत्ताछे, व्याख्याननी कळा छे, शासनप्रभावना कर- बाजुना गामोमा खबर पडतां आगेवान गृहस्थो तथा वानी शक्ति छे. आथी जो तेओ पदारूढ बने तो | भक्तो तुरत साता पूछवा आववा लाग्या. पण पृ० अमी शासननी प्रभावना अधिक थाय. पण ते समजता| वि०म० नु चित्त तो नवकार मंत्रनी स्मृतिमा ज हतु. हता के-पू० गुरुदेवनी पदारूढ थवानी बिलकुल | | कोण आवे छे अने कोण जाय छे से तरफ तेओ बहु इच्छा नथी. वडिलोने पण तेमणे पदवी माटे स्पष्ट ना | लक्ष आपता ज न हता. कही दीधी छे तो पछी मारी विनंती तो शेना माने. छतां पू० क्षमा वि० म० ने आशा हती के भविष्यमां आ मांदगी दरमीयान तेमणे लगभग छ थी सात तेओ मारी विनंतीनो स्वीकार करशे. लाख नवकारनो जाप को. खरेखर ! कहेवु पडशे के अमने नवकारमंत्र अस्थिमज्जा थई गयो हतो. अमना पण भाविनी भीतरमां शुपड्य छे ते कोण | रगेरगमां लोहीना अकेअक अणुमां नवकारमंत्र प्रत्येनी जाणी शके ! क्यारेक मनुष्य धारे के कर्डक अने बने श्रद्धा प्रेम अने भक्ति हती. पोताना दीर्घ काळना संयम छे कईक. मनुष्य पोतानी भविष्यनी आशाओनो महेल | जीवनमां पंच परमेष्ठिनी असाधारण उपासना करी तैयार करे छ, पण कर्मनी कारमी सत्तानो प्रचंड हती. आथी ज तेओ आ समये लाखोनी संख्यामां नवपवन अक काची सेकंडमां से आशाना महेलने कडबु- | कार मंत्रनो जाप करी शक्या. ताव सखत रहेवा छतां भूस तोडी नाखे छे. अयोध्या नगरीनी प्रजा आनंदमां | तेमना मुख उपर जराय उदासीनता के दुःखनी अकेय हती,अने आवतीकाले रामचन्द्रजीने राजगादीबिराज- | रेखा जणाती न हती.खरेखर ! महापुरुषो 'पुरुषार्थथी मान करवाना मनोरथोसेवीरहीहती, पण बीजे दिवसे | न पलटी शकाय अवी क्षणोने प्रारब्धनी भेट गणी राम वनवास तरफ चाल्या अने प्रजानी आंखोमांथी | वधावी ले छे'. आ समये पू० अमी वि० म० नी शोकना अश्रनी धाराओ बहेवा मांडी. पहेला कोण उत्कट बनेली समाधि "दुःखं दुष्कृतसंक्षयाय मह. जाणतु हतु के अयोध्या नगरीनी प्रजा माटे आ | ताम्" से वचनने याद करावती हती. आ समये पू० हर्षनो दिवस शोक माटे थशे. भाविनी कळा सदा मु० श्री क्षमा०वि० महाराज रात भने दिवस गुरुदेवनी मकळ ज रही छे. अहीं पू० क्षमा वि० म0 नी प० / सेवामां खडे पगे हाजर रहेता. मांदगीमां अनेक गरदेवने 'पदवी प्रदान कराववानी भावना पण | रात्रिभो पसार थई गई. तेवामां अचानक श्रावण अपूर्ण रही. वद त्रीजनी काळमुख समी रात्रि आवी पहोंची. लग भग 9-30 नो समय हतो. संथारा पोरिसी भणाव्या गुरुसेवा अने गुरुविरह बाद नवकारमंत्रनु स्मरण करता करता पू. अमी वि० वि० सं० 1986 मां पू० अमी वि० महाराजे | म० नो आत्मा पहोंची गयो अमरलोकमां अने काया सादडी चातुर्मास कर्य. भा चातुर्मासमां तेमनु शरीर | पडी रही मृत्युलोकमां. आम अकाभेक अनेक जीवोनी