SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 218
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ठाणं ठा.२ उ. 2 205 वा गच्छेज्जा, एवं सव्वदेवा, पुढविकाइया दुगइया दुयागइया प० तं०-पुढविकाइए पुढविकाइएसु उववज्जमाणे पुढविकाइएहिंतो वा णो पुढविकाइए हिंतो वा उववओज्जा / से चेवणं से पुढविकाइयत्तं विप्पजहमाणे पुढविकाइयत्ताए वा णो पुढविकाइयत्ताए वा गच्छेज्जा, एवं जाव मणुस्सा // 33 // दुविहा णेरइया प० तं० भवसिद्धिया चेव, अभवसिद्धिया चेव, जाव वेमाणिया। दुविहा णेरइया प० तं० अणंतरोववण्णगा चेव परंपरोववण्णगा चेव, जाव वेमाणिया। दुविहा णेरइया प० तं० गइसमावण्णगा चेव, अगइसमावण्णगा चेव, जाव वेमाणिया / दुविहा णेरइया प० तं० पढमसमयउववण्णगा चेव, अपढमसमयउववण्णगा चेव, जाव वेमाणिया। दुविहा णेरइया प० तं. आहारगा चेव, अणाहारगा चेव, एवं जाव वेमाणिया। दुविहा णेरइया पण्णत्ता तं०, उस्सासगा चेव णोउस्सासगा चेव, जाव वेमाणिया / दुविहा णेरइया प० त० सइंदिया चेव, अणिंदिया चेव, जाव वेमाणिया / दुविहा णेरइया प० तं० पजत्तगा चेव, अपज्जत्तगा चेव, जाव वेमाणिया। दुविहा णेरइया प० तं० सण्णी चेव, असण्णी चेव, एवं जाव पंचिंदिया सव्वे विगलिंदियवज्जा, जाब वाणमंतरा / दुविहा णेरइया प० तं० भासगा चेव अभासगा चेव, एवमेगेंदियवज्जा सव्वे / दुविहा णेरइया प० त० समद्दिट्ठिया चेव मिच्छहिट्ठिया चेव, एगिदियवजा सव्वे / दुविहा णेरइया प० तं० परित्तसंसारिया चेव, अणंतसंसारिया चेव जाव वेमाणिया। दुविहा णेरइया प० तं० संखेजकालसमयढिइया चेव असंखेजकालसमयढिइया चव, एवं पंचिंदिया, एगिंदिया विगलिंदियवजा जाव वाणमंतरा। दुविहा णेरइया प० तं. सुलभबोहिया य दुल्लभबोहिया य जाव वेमाणिया। दुविहा णेरइया प० तं० कण्हपक्खिया चेव सुक्कपक्खिया चेव, जाव वेमाणिया / दुविहा णेरइया प० तं० चरिमा चेव अचरिमा चेव, जाव वेमाणिया // 34 // दोहिं ठाणेहिं आया अहे लोग जाणइ पासइ, तं० समोहएणं चेव अप्पाणेणं आया अहे लोगं जाणइ पासइ, असमोहएणं चेव अप्पाणेणं आया अहे लोगं जाणइ पासइ, आहोहि समोहया समोहएणं चेव अप्पाणेणं आया अहे लोगं जाणइ पासइ, एवं तिरियलोगं उड्डलोग केवलकप्पं लोगं / दोहिं ठाणेहिं आया अहे लोगं जाणइ पासइ, तं जहा-- विउविएणं चेव अप्पाणेणं आया अहेलोगं जाणइ पासइ, अविउव्विएणं चेव अप्पाणेणं आया अहेलोगं जाणइ पासइ, आहोहि विउव्वियाविउविएणं चेव
SR No.004390
Book TitleAngpavittha Suttani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanlal Doshi, Parasmal Chandaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sadhumargi Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year1982
Total Pages1476
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, agam_acharang, agam_sutrakritang, agam_sthanang, agam_samvayang, agam_bhagwati, agam_gyatadharmkatha, agam_upasakdasha, agam_antkrutdasha, & agam_anutta
File Size23 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy