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________________ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक * 142 व्यवहारनयं प्ररूपयतिसंग्रहेण गृहीतानामर्थानां विधिपूर्वकः / योवहारो विभागः स्याद्व्यवहारो नयः स्मृतः // 58 // स चानेकप्रकारः स्यादुत्तरः परसंग्रहात् / यत्सत्तद्र्व्यपर्यायाविति प्रागृजुसूत्रतः॥५९॥ कल्पनारोपितद्रव्यपर्यायप्रविभागभाक् / प्रमाणबाधितोन्यस्तु तदाभासोऽवसीयताम् // 60 // परसंग्रहस्तावत्सर्वं सदिति संगृह्णाति, व्यवहारस्तु तद्विभागमभिप्रैति यत्सत्तद्रव्यं पर्याय इति। यथैवापरसंग्रहः सर्वद्रव्याणि द्रव्यमिति संगृह्णाति सर्वपर्यायाः पर्याय इति। व्यवहारस्तद्विभजते यद्रव्यं तज्जीवादिषड्विधं, य: पर्याय: स द्विविधः क्रमभावी सहभावी चेति। पुनरपि संग्रहः सर्वान् जीवादीन् संगृह्णाति जीव: पुद्गलो धर्मोऽधर्मः आकाशं काल इति, क्रमभुवश्च पर्यायान् क्रमभाविपर्याय इति, सहभाविपर्यायांस्तु संग्रह नय का वर्णन कर श्री विद्यानन्द स्वामी अब क्रमप्राप्त व्यवहार नय का प्ररूपण करते हैं। संग्रह नय के द्वारा गृहीत पदार्थों का विधिपूर्वक जो अवहार (विभाग) किया जाता है, वह व्यवहारनय माना गया है। अर्थात् विभाग करने वाला व्यवहार नय है। और वह व्यवहार नय परसंग्रह से उत्तरवर्ती होकर ऋजुसूत्र नय से पहिले रहता हुआ अनेक प्रकार का है। परसंग्रहनय ने सत् को विषय किया था। जो सत् है वह द्रव्य और पर्याय रूप है। इस प्रकार विभाग कर जानने वाला व्यवहार नय है। यद्यपि अपर संग्रह ने भी द्रव्य और पर्यायों को जान लिया है, किन्तु अपरसंग्रह ने सत् का भेद करते हुए उन द्रव्य पर्यायों को नहीं जाना है। पहिले से ही विभाग को नहीं करते हुए युगपत् सम्पूर्ण द्रव्यों को जान लिया है। अथवा दूसरे अपरसंग्रह ने शीघ्र ही सम्पूर्ण पर्यायों को विषय कर लिया है। किन्तु व्यवहार ने विभाग को करते हुए जाना है। व्यवहार के उपयोगी महासामान्य के भी भेदों को जानने वाला वह व्यवहार, नय है।५८-५९॥ द्रव्य और पर्यायों के आरोपित किये गये कल्पित विभागों को जो नय कदाग्रह पूर्वक ग्रहण करता है वह प्रमाणों से बाधित व्यवहार नय से पृथक् व्यवहार नयाभास है। ऐसा जानना चाहिए। क्योंकि द्रव्य और पर्यायों का विभाग कल्पित नहीं है॥६०॥ सबसे पहिले परसंग्रह तो ‘सम्पूर्ण पदार्थ सत् हैं' इस प्रकार संग्रह करता है और व्यवहार नय उन सत् पदार्थों के विभाग करने का अभिप्राय रखता है कि जो सत् है वह द्रव्य या पर्याय रूप है। तथा जिस प्रकार अपर संग्रह नय सम्पूर्ण द्रव्यों को एक द्रव्यपने से संग्रह करता है और सम्पूर्ण त्रिलोक त्रिकालवर्ती पर्यायों को एक पर्यायपने से संग्रह कर लेता है। किन्तु व्यवहार नय उनका द्रव्य और पर्याय से दो विभाग करता है, जो द्रव्य है वह जीव, पुद्गल, आदि छह प्रकार का है, और जो पर्याय है वह क्रमभावी और सहभावी इस भेद से दो प्रकार की है। अपर संग्रह की एक बार प्रवृत्ति हो चुकने के बाद फिर भी उसका व्याप्य अपर संग्रह नय तो सम्पूर्ण जीवादि को जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इस प्रकार व्याप्य अनेक जीव आदि का संग्रह करता है तथा क्रम से होने वाली अनेक सजातीय पर्यायों को ये क्रमभावी पर्याय हैं इस प्रकार संग्रह करता है एवं सहभावी अनेक जातिवाली पर्यायों को ये सहभावी पर्याय हैं, इस प्रकार संग्रह करता है। किन्तु यह व्यवहार नय तो उन संग्रह नय द्वारा गृहीत विषयों के विभाग करने की इस प्रकार अभिलाषा करता है कि, जो जीव द्रव्य है वह मुक्त और संसारी ह, और जो पुद्गलद्रव्य है वह अणुस्वरूप और स्कन्धस्वरूप है।
SR No.004287
Book TitleTattvarthashloakvartikalankar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSuparshvamati Mataji
PublisherSuparshvamati Mataji
Publication Year2010
Total Pages358
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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