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________________ प्रथम जिनेश्वर प्रणमीओ, जास सुगंधी रे काय; कल्पवृक्ष परे तास, ईंद्राणी नयन जे, भंग परे लपटाय. ३ रोग उरग तुज नवि नडे, अमृत जे आस्वाद; तेहथी प्रतिहत तेह, मान कोई नवि करे, जगमां तुमशु रे वाद. वगर धोई तुज निरमली, काया कंचनवान; नहीं प्रस्वेद लगार, तारे तुं तेहने जे धरे ताहरू ध्यान. राग गयो तुज मन थकी तेहमां चित्र न कोय; रूधिर आमिषथी, राग गयो तुज जन्मथी। दूधसहोदर होय. श्वासोश्वास कमल समो, तुज लोकोत्तर वात; देखे न आहार निहार, चरम चक्षु धणी अहवा तुज अवदात. चार अतिशय मूलथी, ओगणीस देवना कीधः। कर्म खप्याथी अग्यार, चोत्रीस अम अतिशया, 'समवायांगे' प्रसिद्ध. जिन उत्तम गुण गावतां, गुण आवे निज अंग; - "पद्मविजय" कहे अह, समय प्रभु पालजो, जिम थाउं अक्षय अभंग. ७ DOOOG 900 A POOOS CaODOG GC नमो नमामलाचलगार नमो नम OF Personal data re Only P8A Maintamailo oweja ellesa
SR No.004225
Book TitleChari Palak Padyatra Sangh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajhans Group of Industries
PublisherRajhans Group of Industries
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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