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________________ ३८ श्री स्थानांग सूत्र विवेचन - सूत्रकार ने उपरोक्त सूत्र में जीव तत्त्व की द्विविधता (जीव तत्त्व का स्वरूप पक्षप्रतिपक्ष के रूप में) प्रतिपादित की है। त्रस - त्रस नाम कर्म के उदय से जो जीव त्रास एवं भय तथा सर्दी गर्मी आदि से अपना बचाव करने के लिये गमनागमन कर सकते हैं वे त्रस कहलाते हैं। जैसे - बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चउरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय। . स्थावर - स्थावर नाम कर्म के उदय से जो जीव गति रहित - स्थिर स्वभाव वाले हैं वे स्थावर कहलाते हैं। जैसे एकेन्द्रिय जीव - पृथ्वीकाय, अप्काय, तेउकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय। ____ आगासे चेव, णो आगासे चेव। धम्मे चेव, अधम्मे चेव। बंधे चेव, मोक्खे चेव। पुण्णे चेव, पावे चेव। आसवे चेव, संवरे चेव। वेयणा चेव, णिज्जरा चेव। दो किरियाओ पण्णत्ताओ तंजहा - जीवकिरिया चेव, अजीवकिरिया चेव। जीवकिरिया दुविहा पण्णत्ता तंजहा - सम्मत्तकिरिया चेव, मिच्छत्तकिरिया चेव। अजीवकिरिया दुविहा पण्णत्ता तंजहा - इरियावहिया चेव, संपराइया चेव। दो किरियाओ पण्णत्ताओ, तंजहा - काइया चेव, अहिगरणिया चेव। काइया किरिया दुविहा पण्णत्ता,तंजहा - अणुवरयकाय किरिया चेव, दुप्पउत्तकायकिरिया चेव। अहिगरणिया किरिया दुविहा पण्णत्ता, तंजहा - संजोयणाहिगरणिया चेव, णिव्वत्तणाहिगरणिया चेव। दो किरियाओ पण्णत्ताओ, तंजहा - पाउसिया चेव, परियावणिया चेव। पाउसिया किरिया दुविहा पण्णत्ता, तंजहा - जीवपाउसिया चेव, अजीवपाउसिया चेव। परियावणिया किरिया दुविहा पण्णत्ता, तंजहा - सहत्थपरियावणिया चेव, परहत्थपरियावणिया चेव। दो किरियाओ पण्णत्ताओ, तंजहा - पाणाइवाय किरिया चेव, अपच्चक्खाण किरिया चेव। पाणाइवाय किरिया दुविहा पण्णत्ता, तंजहा - सहत्थपाणाइवाय किरिया चेव, परहत्थपाणाइवाय किरिया चेव। अपच्चक्खाण किरिया दुविहा पण्णत्ता, तंजहा - जीव अपच्चक्खाण किरिया चेव, अजीव अपच्चक्खाण किरिया चेव॥१३॥ कठिन शब्दार्थ - आगासे - आकाशास्तिकाय, किरियाओ - क्रियाएं, सम्मत्तकिरिया - सम्यक्त्व क्रिया, मिच्छत्तकिरिया - मिथ्यात्व क्रिया, दुविहा - दो प्रकार की, इरियावहिया - ईर्यापथिकी, संपराइया - साम्परायिकी, काइया - कायिकी, अहिगरणिया - आधिकरणिकी, अणुवरयकाय - अनुपरतकाय, दुप्पउत्तकाय - दुष्प्रयुक्त काय, संजोयणाहिगरणिया - Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004186
Book TitleSthananga Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Banthiya, Parasmal Chandaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2008
Total Pages474
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sthanang
File Size10 MB
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