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________________ दसवां चरम पद - संस्थान की अपेक्षा चरम अचरम आदि Jain Education International ३०७ भावार्थ - प्रश्न - हे भगवन् ! परिमण्डल संस्थान क्या संख्यात हैं, असंख्यात हैं अथवा अनन्त हैं ? उत्तर - हे गौतम! परिमण्डल संस्थान संख्यात नहीं, असंख्यात नहीं, किन्तु अनन्त हैं । इसी प्रकार वृत्त से लेकर यावत् आयत तक के विषय में समझ लेना चाहिए। परिमंडले णं भंते! संठाणे किं संखिज्ज पएसिए, असंखिज्ज पएसिए, अणंत एसिए ? गोमा ! सिय संखिज्ज पएसिए, सिय असंखिज्ज पएसिए, सिय अनंत पएसिए । एवं जाव आयए । भावार्थ - प्रश्न हे भगवन् ! परिमण्डल संस्थान क्या संख्यात प्रदेशी है, असंख्यात प्रदेशी है अथवा अनन्त प्रदेशी है ? ...........................0000000 उत्तर - हे गौतम! परिमण्डल संस्थान कदाचित् संख्यात प्रदेशी है, कदाचित् असंख्यात प्रदेशी है और कदाचित् अनन्त प्रदेशी है। इसी प्रकार वृत्त से लेकर आयत तक के विषय में समझ लेना चाहिए । परिमंडले णं भंते! संठाणे संखिज्ज पएसिए किं संखिज्ज पएसोगाढे, असंखिज्ज पएसोगाढे, अनंत पएसोगाढे ? गोयमा ! संखिज्ज पएसोगाढे, णो असंखिज्ज पएसोगाढे, णो अनंत पएसोगाढे। एवं जाव आयए । भावार्थ- प्रश्न - हे भगवन् ! संख्यात प्रदेशी परिमण्डल संस्थान क्या संख्यात प्रदेशों में अवगाढ़ होता है, असंख्यात प्रदेशों में अवगाढ़ होता है अथवा अनन्त प्रदेशों में अवगाढ़ होता है ? उत्तर - हे गौतम! संख्यात प्रदेशी परिमण्डल संस्थान संख्यात प्रदेशों में अवगाढ़ होता है, किन्तु न तो असंख्यात प्रदेशों में अवगाढ़ होता है और न अनन्त प्रदेशों में अवगाढ़ होता है। इसी प्रकार आयत संस्थान तक के विषय में कह देना चाहिए। परिमंडले णं भंते! संठाणे असंखिज्ज पएसिए किं संखिज्ज पएसोगाढे, असंखिज एसोगाढे, अनंत पएसोगाढे ? गोयमा ! सिय संखिज्ज पएसोगाढे, सिय असंखिज्ज पएसोगाढे, णो अनंत पएसोगाढे । एवं जाव आयए । - भावार्थ प्रश्न हे भगवन्! असंख्यात प्रदेशी परिमण्डल संस्थान क्या संख्यात प्रदेशों में अवगाढ़ होता है, असंख्यात प्रदेशों में अवगाढ़ होता है अथवा अनन्त प्रदेशों में अवगाढ़ होता है ? उत्तर - हे गौतम! असंख्यात प्रदेशी परिमण्डल संस्थान कदाचित् संख्यात प्रदेशों में अवगाढ़ For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004094
Book TitlePragnapana Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Banthiya, Parasmal Chandaliya
PublisherAkhil Bharatiya Sudharm Jain Sanskruti Rakshak Sangh
Publication Year2008
Total Pages414
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size9 MB
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