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________________ २३८ जैनागम सिद्ध मूर्तिपूजा पण छे ज, बलके चढीयतो छे, एम बाळ जीवोनी अपेक्षाए कही शकाय . आथी नक्की थाय छे के ज्यां सुधी मूर्तिमंत विश्वनुं अस्तित्व छे, त्यां सुधी मूर्तिनुं अस्तित्व छे ज ते पछी कोई कदाग्रहने वश थईने के मतना एकान्त ममताने वश थईने तेनो अपलाप करवा प्रेराय तेम छतां तेवा मानवोने पण आत्मोकर्ष काजे कोई कोईने आलंबन तो लेवुं ज पडे ते सर्व विदित छे. (२३) श्री जीवानुशासन नी टीका मा. पू. आ. देव. सूम. जगावे छे. xx यः किल लौकिकैर्निजदेवकुले वास्तुविद्योक्तप्रासादादिः कार्यते सोऽस्माकमपि देवसदने विधीयते, न तत्र मिथ्यात्वम् x x लौकिक पोताना देवालयोमां वास्तुविद्यामां कह्या मुजब जे मंदिर वगेरे करावे छे, ते आपणा पण देवमंदिरोमां (दहेरासरोमां) कराय छे, तेमां मिथ्यात्व लागतुं नथी. (२४) श्री स्तवपरिज्ञामां जणाव्युं छे.के णिप्फन्नस्स य सम्मं तस्स पइट्ठावणे विहि एसो । सठ्ठाणे सुहजोगे अहिवासणमुचियपूयाए ॥२३॥ चिइवंदण थुडवुड्डी उस्सग्गो साहु सासणसुरीए । थयसरणपुयकाले ठवणा मंगलपुव्वा तु ||२४|| सम्यग् रीते तैयार थयेला (बिंब) नी प्रतिष्ठा करवामां विधि आ प्रमाणे छे के - योग्यस्थानमां, शुभयोगमां, उचितपूजा - पूर्वक अधिवासना करवी. ॥२३॥ चैत्यवंदन, वधती जती स्तुति, शासनदेवीने उद्देशीने योग्य रीते कायोत्सर्ग, स्तवपाठ, नामस्मरण, पूजा अने योग्य समये मंगल (करवा) पूर्वक स्थापना करवी. (२५) श्री प्रतिष्ठा कल्पमां ग्रंथकार श्रीए जणाव्युं छे के x x सर्वाङ्गीणतदुपकरणमीलन- नानास्थान श्रीसङ्घगुर्वाकारण - प्रौढप्रवेश Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004077
Book TitleJainagam Siddh Murtipuja
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhushan Shah
PublisherChandroday Parivar
Publication Year2014
Total Pages352
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Devdravya
File Size10 MB
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