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________________ मार्ग के अग्रणी थे और शत्रुजय, गिरनार, आबू आदि तीर्थों के प्रतिष्ठाकारक थे। १५४२ के लेख में लिखा है शत्रुजय आदि तीर्थों के उद्धार के लिए उद्यम करने वाले थे। (श्री देवचन्द्रजी के उपदेशों और प्रयत्नों से शत्रुजय आदि तीर्थों के उद्धार करने के लिए शत्रुजय तीर्थ पर कारखाना खोला गया था। यही कारखाना पेढ़ी का रूप धारण कर आनन्दजी कल्याणजी की पेढ़ी के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो आज भी समस्त तीर्थों के उद्धार के लिए प्रयत्नशील है।) लेखाङ्क १५६२ - सम्वत् १८११ में स्थापित उपाश्रय का यह लेख साधु-परम्परा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। श्री जिनलाभसूरि के विजयराज्य में क्षेमकीर्ति शाखा के महोपाध्याय रत्नशेखरजी के मुख्य शिष्य रूपदत्तगणि थे और उनके गुरु भाई थे - दीपकुञ्जर, महिमामूर्ति और लक्ष्मीसुख। रूपदत्तजी के शिष्य थे - हस्तरत्नगणि, ऋद्धिरत्न, ज्ञानकल्लोल और मुनिकल्लोल। प्रशिष्य थे - युक्तिसेन, महिमाराज आदि। वाचक हस्तरत्नगणि के उद्यम से नाथूसर में यह नवीन उपाश्रय। बारहट खेतजी, नथमल्लजी, हिम्मतसिंहजी, लालचन्दजी, सूर्यमल्लजी, दौलतसिंहजी, सगतदानजी, वखतसिंहजी और भवानीसिंह के सहयोग से बना। लेखाङ्क १५६६ - सम्वत् १८१७ में उदयपुर में समस्त संघ ने मिलकर ऋषभदेव का मंदिर बनवाया और प्रतिष्ठा करवाई। प्रतिष्ठाकारक थे - उद्योतनसूरि, जिनेश्वरसूरि, जिनचन्द्रसूरि, अभयदेवसूरि, जिनवल्लभसूरि और जिनदत्तसूरि की परम्परा में तथा श्री जिनकुशलसूरि की परम्परा में श्री जिनवर्धनसूरि की पिप्पलक शाखा में जिनसिंहसूरि > जिनचन्द्रसूरि > जिनरत्नसूरि > जिनवर्धमानसूरि > जिनधर्मसूरि > जिनचन्द्रसूरि के शिष्य महोपाध्याय हीरसागर। महाराणा अरिसिंह का विजयराज्य था। लेखाङ्क १५६७ से १५७६ - तक के लेख इसी परम्परा से सम्बन्धित हैं। लेखांक १५७२ के अनुसार पद्मनाभ मंदिर में पद्मनाभ मूलनायक हैं जो कि आगामी चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर होंगे। लेखाङ्क १६०३ - सम्वत् १८३७ में साण्डेचा गोत्रीय ही. रायमल पुत्र देवचन्द्र, रामगोपाल आदि ने श्री जिनकुशलसूरिजी की पादुका बनवाकर विजयगच्छीय श्री महेन्द्रसूरि से प्रतिष्ठा करवाई थी। (महोपाध्याय विनयसागर प्रतिष्ठा लेख संग्रह भाग २ लेखांक ३७३ के अनुसार देवचन्द के पुत्र जीवराज आमेर देशाधिपति द्वारा प्रदत्त दीवान पद के धारक थे।) लेखाङ्क १६१७ - सम्वत् १८४४ में महाराजा श्री विजयसिंहजी के विजयराज्य में हम्मीरपुर (फलौदी) में सवाई युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि की शाखा में सुमतिविमलगणि > सुमतिसुन्दरगणि > सुमतिहेमगणि > कुशलभक्तिगणि > पं० रूपधीर और हितधीर ने छतरी बनवाई। लेखाङ्क १६९५ - सम्वत् १८६० में जोधपुर के महाराजा मानसिंहजी के विजयराज्य में फलौदी में युगप्रधान श्री जिनचन्द्रसूरिजी के शिष्य महोपाध्याय पुण्यप्रधानगणि > महोपाध्याय सुमतिसागरगणि पुरोवाक् XXV Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004075
Book TitleKhartargaccha Pratishtha Lekh Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVinaysagar
PublisherPrakrit Bharti Academy
Publication Year2005
Total Pages604
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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