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________________ के पास जाकर उनसे राजा की याचना करो। उसके बाद युगलिक नाभि कुलकर के पास जाकर के राजा की याचना की, तब नाभिकुलकर ने कहा कि तुम्हारा राजा ऋषभ ही बने।। यह सुनते ही हर्षित हुए युगलिये प्रभु के पास जाकर यह हकीकत निवेदन करके प्रभु का राज्याभिषेक करने हेतु पानी लेने के लिए सरोवर की ओर गये। उस समय शक्रेन्स का सिंहासन कंपित हुआ। इन्द्र अवधिज्ञान से ऋषभदेव का राज्याभिषेक काल जाना और शीघ्र ही देवों सहित प्रभु के पास आया। इन्द्र ने आकर राज्य योग्य मुकुट, कुण्डल हारादि पहना कर सिंहासन स्थत्तपित कर प्रभु का राज्याभिषेक किया। इतने में वे युगलिक जन कमल के पात्रों में पानी भरकर वहां आ पहुंचे। भगवान का सारा शरीर अलंकारों से अलंकृत और वस्त्रों से भूषित देखकर दोनों चरण के अंगूठे पर जल चढाया। इन्द्र ने उनका विनय विवेक देखकर कहा :- यह लोग बहुत विनीत है। इससे इन्द्र ने इस नगरी का नाम " विनीता नगरी'' नाम स्थापन किया। * शासन व्यवस्था का विकास एवं दंड नीति :- राज्याभिषेक के पश्चात् ऋषभदेव ने राज्य की सुव्यवस्था और विकास के लिए चार प्रकार के कल बनाये. उनके नाम इस प्रकार थे- 1.उग्र 2 भोग 3.राजन्य 4. क्षत्रीय 1. नगर की रक्षा का काम यानी सिपाहीगिरी करनेवालों को एवं चोर लुटेरों आदि प्रजापीडक लोगों को दंड देनेवालों का जो समूह था उस समूह के लोग उग्रकुलवाले कहलाते थे। 2. जो लोग मंत्री का कार्य करते थे वे भोगकुलवाले कहलाते थे। 3. जो लोग प्रभु के समयवयस्क थे और प्रभु की सेवा में हर समय रहते थे वे राजन्यकुलवाले कहलाते थे। 4. बाकी के जो लोग थे वे सभी क्षत्रिय कहलाते थे। विरोधी तत्त्वों से राज्य की रक्षा करने तथा दुष्टों, अपराधियों को दण्डित करने के लिए उन्होंने चार प्रकार की सेना और सेनापतियों की व्यवस्था की। अपराधी की खोज एवं अपराध निरोध के लिए साम, दाम, दण्ड और भेद नीति तथा निम्नलिखित चार प्रकार की दण्ड व्यवस्था भी की। 1. परिभाषक :- थोडे समय के लिए नजरबन्द करना - अर्थात् अपराधी को कुछ समय के लिए आक्रोशपूर्ण शब्दों से दण्डित करना। क्रोधपूर्ण शब्दों में अपराधी को यहीं बैठ जाओ' का आदेश देना। 2. मण्डलिबन्ध :- नजरबन्ध करना - नियमित क्षेत्र से बाहर न जाने देने का आदेश देना। 3. बन्ध :- बंधन का प्रयोग। बन्दीगृह जैसे किसी एक स्थान में अपराधी को बन्द करके रखना। 4. घात :- डंडे का प्रयोग | अपराधी के हाथ - पैर आदि शरीर के किसी अंग - उपांग का छेदन करना। * धर्मानुकूल लोक व्यवस्था :- राष्ट्र की सुरक्षा और उत्तम व्यवस्था कर लेने के पश्चात् ऋषभदेव ने लोक जीवन को स्वावलम्बी बनाना आवश्यक समझा। राष्ट्रवासी अपना जीवन स्वयं सरलता से बिता सकें ऐसी शिक्षा देने के विचार से उन्होंने असि, मसि और कृषि कर्म का प्रजा को उपदेश दिया। * असि कर्म शिक्षा :- ऋषभदेव ने एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो लोगों की सुरक्षा का दायित्व संभालने में सक्षम हो। उन्हें तलवार, भाला, बरछी आदिशस्त्र चलाने सिखाए। साथ में कब, किस पर इन शस्त्रों का प्रयोग करना चाहिए, इसका भी निर्देश दिया। वेलोग देश की सुरक्षा केलिए सदा तत्पर रहतेथे| इस वर्गको क्षत्रिय नाम से पुकारागया। * मसि कर्म शिक्षा :- (मसि यानी स्याही) मसि कर्म का तात्पर्य लिखा पढी से है। ऋषभदेव ने एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो उत्पादन की गई वस्तुओं का विनिमय कर सकें। एक-दूसरे तक पहुंचा सके| प्रारंभ में मुद्रा का प्रचलन सीमित था। 12
SR No.004052
Book TitleJain Dharm Darshan Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNirmala Jain
PublisherAdinath Jain Trust
Publication Year2011
Total Pages146
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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