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________________ अध्याय ३ बृहद्गच्छ के प्रमुख आचार्य एवं इस गच्छ से उद्भूत विभिन्न गच्छ बृहद्गच्छ में समय-समय पर अनेक प्रबुद्ध मुनिजन हुए, जिनके द्वारा रचित विभिन्न कृतियाँ प्राप्त होती हैं। आख्यानकमणिकोश, जिसका प्रारम्भ में उल्लेख आ चुका है, पर वि०सं० १९९१ई० सन् १९२५ में बृहद्गच्छ के ही आम्रदेवसूरि ने वृत्ति की रचना की, १ जिसकी प्रशस्ति इस प्रकार है : ज्ञानदिरत्नवसतिर्जनमान्यलक्ष्मीजन्माग्रभूमिरभितो बहुसत्त्वसेव्यः । निर्धौतकर्ममलनिर्मलधर्मनीरः, क्षोणीभृदाश्रितगरिष्ठगभीरमध्यः ॥१॥ अच्युतप्रवणावासो, मर्यादाऽनतिवर्तकः । अस्ति स्वच्छो बृहद्गच्छ, श्रीमान् नाथ इवाम्भसाम् ॥२॥ इति नीरधितुल्यगुणे, दयासुधापास्तजन्म-रुग्-मरणे । कचिदतिशायिनि समये, शिष्टाः ! निशमयत यज्जातम् ॥३॥ मुनिविबुध (वि) धृतजिनमतमन्दरमथिमथ्यमानतन्मध्यात् । स्फूर्जन्महाप्रभाव:, प्रादुरभूद् रम्यरत्नचयः || ४ || तथा हि - Jain Education International — श्रीदेवसूरिः सुमनःसमृद्धः, समुल्लसत्सत्फलपत्रशाखः । कुतोऽप्यथो अविरभूदमुष्मात्, सुरावगीतोपचिपारिजातः ॥५॥ अनेकविकृतिक्रियाकुटिलकर्मरूपामया ऽपहारकरणक्षमः श्रुतिविचारदक्षः शुचिः । प्रवृद्धकरुणामृतस्समुदपादि धन्वन्तरिः, श्रियां पदमनागसामजितसूरिरर्यः सताम् ॥६॥ For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004033
Book TitleBruhad Gaccha ka Itihas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherOmkarsuri Gyanmandir Surat
Publication Year2013
Total Pages298
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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