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________________ नैष्ठिकाचार २६९ गृहस्थ भी देशव्रती है और महाव्रत का अभिलाषी है अतः उस महत्त्वशाली अवस्था को प्राप्त करना चाहता है। इस दृष्टि से वह इस प्रतिमा में नियत काल तक उसे स्वीकार कर उतने समय महाव्रती की तरह विशुद्ध परिणामवाला बन जाता है। द्वितीय प्रतिमावाला इस व्रत का आरंभ करता है तथा तृतीय प्रतिमा में तथा उससे आगे-आगे की प्रतिमाओं में उस व्रत का पालन करते हुए वृद्धि होती है और तब दिगम्बर मुनि अवस्था में उसका पूर्णरूप प्राप्त करने की योग्यता आती है। मन बड़ा चञ्चल है। अनादि से बिगड़े हुए संस्कार इस पर हैं। उन संस्कारों को दूर कर वायुवेग से भी अत्यन्त चञ्चल और बिजली की चमक से भी अधिक परिवर्तनशील उस मानसिक वृत्ति को सुसंस्कारों से संस्कारित करना बहुत कठिनतम कार्य है। यही एक मात्र कार्य है जिसकी सिद्धि के लिए मुनिजन जीवनभर प्रयत्न करते हैं। अनेक प्राणियों ने तो अनेकानेक जन्मों में मुनिव्रत धारण कर इस पर आरोहण किया है। तब कहीं जाकर सफलता पाई है। अनेक इतने प्रयत्नों पर भी सामायिक को प्राप्त करने में असफल रहे हैं। इस प्रकार इस एकमात्र लक्ष्यभूत सामायिक की प्राप्ति के लिए बहुत सावधानी के साथ सामायिक प्रतिमावान् गृहस्थ नियत समय तक प्रतिज्ञाबद्ध होकर प्रयत्न करता है। गृहस्थ के सप्त शीलों में सामायिक शील यहाँ पूर्ण होता है। पूर्व या उत्तर मुख होकर खड़े होकर नमस्कार मन्त्र का नौबार स्मरण कर उस दिशा में होनेवाले केवली, श्रुतकेवली, आचार्य, उपाध्याय, साधुजन, जिनमन्दिर, जिनतीर्थ, चरणचिह्न और भगवान् के समवसरण आदि मंगलभूत वस्तुओं को बारंबार स्मरण कर प्रदक्षिणात्रय के प्रतीक तीन आवर्त पूर्वक उन सबको प्रणाम करे। ऐसा ही चारों दिशाओं में करके पुनः पूर्व या उत्तर मुख हो जाय जैसा पूर्व में था। इसके बाद त्रिलोक में स्थित पंचपरमेष्ठी का तथा कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयों का, तीर्थों का, समवसरणादि समस्त धार्मिक स्थानों का स्मरण कर उन्हें प्रणाम कर बैठ जाय अथवा खड़े रहकर सामायिक करे। सर्व प्रथम अपने जीवनकाल के या दैनिक जीवन के पापों और अपराधों का विचार कर उनकी आलोचना करे। भगवान् से कृत कर्मों के लिए क्षमा याचना करे। इसके बाद आगे कभी ऐसे पाप का अपराध मैं न करूँ ऐसा विचार कर उनका त्याग करे। इस तरह प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान विधि को करके विषय कषायों की चिन्ता से सब प्रकार से मुक्त होकर समता भाव का आसेवनकर स्वात्मावलंबियों व श्रेष्ठ पञ्च परमेष्ठियों की वन्दना Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.004002
Book TitleShravak Dharm Pradip
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaganmohanlal Shastri
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year1997
Total Pages352
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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